होमआसपास-प्रदेशछत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 2026 असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण - प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस...

छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 2026 असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण – प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस ने किया कड़ा विरोध; उच्च न्यायालय जाने की चेतावनी

रायपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल द्वारा 10 मार्च 2026 को “छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक, 2026” के मसौदे को मंजूरी दिए जाने के विरोध में प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस (पीसीए) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। न्याय, अंतरधार्मिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध इस संगठन ने इस विधेयक को असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और राजनीति से प्रेरित बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है।

विधेयक की आड़ में अल्पसंख्यकों को निशाना
पीसीए के समन्वयक भूपेंद्र खोरा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के बारे में नहीं है। इसका असली उद्देश्य छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म सहित अल्पसंख्यक धर्मों की वैध अभिव्यक्ति को व्यवस्थित ढंग से प्रतिबंधित करना और उसे अपराध घोषित करना है।”

संगठन का आरोप है कि 1968 के मूल अधिनियम का दशकों से ईसाइयों के विरुद्ध दुरुपयोग हो रहा है। पादरियों, ननों, प्रचारकों और आम चर्च सदस्यों पर जबरन धर्मांतरण के मनगढ़ंत आरोपों में सैकड़ों एफआईआर दर्ज की गई हैं। फिर भी, पचास वर्षों में एक भी दोषसिद्धि नहीं हुई – जो यह सिद्ध करता है कि ये मामले न्याय के लिए नहीं, बल्कि उत्पीड़न के लिए दर्ज किए जाते हैं।

संविधान का उल्लंघन
पीसीए ने तर्क दिया कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 25 का सीधा उल्लंघन है, जो अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म के प्रचार के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित करता है। स्वैच्छिक धर्मांतरण के लिए जिला मजिस्ट्रेट को अनिवार्य पूर्व सूचना, 60 दिन की आपत्ति अवधि और सरकारी स्वीकृति की शर्त लगाकर, इस विधेयक ने एक संवैधानिक अधिकार को प्रशासनिक अनुमति में बदल दिया है – जिसे किसी भी समय अस्वीकार या विलंबित किया जा सकता है।

कठोर दंड का प्रावधान
नया विधेयक सामान्य मामलों में 7 से 10 वर्ष, महिलाओं, नाबालिगों तथा अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़े वर्ग के मामलों में 10 से 20 वर्ष और कुछ मामलों में आजीवन कारावास का प्रावधान करता है। ‘प्रलोभन’, ‘अनुचित प्रभाव’ और ‘धोखाधड़ी के साधन’ जैसे अस्पष्ट और व्यापक शब्दों का इस्तेमाल पहले भी प्रार्थना सभाओं, क्रिसमस कार्यक्रमों और स्वास्थ्य सेवाओं तक को निशाना बनाने के लिए होता आया है।

“घर वापसी” को छूट – कानून का दोहरा चरित्र

संगठन ने विधेयक के उस प्रावधान पर विशेष आपत्ति जताई, जिसमें “घर वापसी” – यानी पैतृक धर्म में पुनः धर्मांतरण – को छूट दी गई है। पीसीए के अनुसार, यह अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध) का खुला उल्लंघन है। एक ओर ईसाई धर्म अपनाने वाले को कठोर कानूनी प्रताड़ना झेलनी होगी, वहीं दूसरी ओर उन्हीं आदिवासी और दलित समुदायों को लक्षित करने वाले पुनः धर्मांतरण अभियानों को पूरी छूट मिलेगी।

शासन विफलताओं से ध्यान भटकाने का उपकरण
डॉ. अखिलेश एडगर ने कहा, “जरूरत शिकायतों की निष्पक्ष और त्वरित जांच की है – न कि ऐसे नए कानून की, जो और भी झूठे मामले और सांप्रदायिक तनाव पैदा करे।”

पीसीए ने आरोप लगाया कि यह विधेयक राज्य सरकार की गंभीर विफलताओं – आदिवासियों की भूमि का हनन, जल संकट, बेरोजगारी, कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराधों – से जनता का ध्यान भटकाने का राजनीतिक हथकंडा है।

उच्च न्यायालय में याचिका और राज्यव्यापी अभियान की घोषणा
पीसीए ने निम्नलिखित तत्काल कदमों की घोषणा की है — छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में संवैधानिक याचिका, झूठे मामलों में फंसे ईसाइयों के लिए कानूनी सहायता, राज्यव्यापी हस्ताक्षर अभियान और प्रार्थना सभाएं, तथा धर्मनिरपेक्ष दलों और नागरिक समाज के साथ मिलकर एकजुट मोर्चा बनाना।

रेव. साइमन दिगबल तांडी ने कहा, “हमें किसी भी धर्म से कोई मतभेद नहीं है। लेकिन जब संविधान का हनन हो, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाए और शासन की विफलताओं को सांप्रदायिक कानूनों की आड़ में छिपाया जाए – तब हम चुप नहीं बैठेंगे।”

संगठन ने राज्यपाल, विवेकशील विधायकों और छत्तीसगढ़ की जनता से इस विभाजनकारी विधेयक को अस्वीकार करने की अपील की है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments