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छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र: क्या गूंजेंगे आदिवासियों के ज्वलंत मुद्दे? विधानसभा सत्र से पहले आदिनिवासी गण परिषद और आदिवासी विकास परिषद ने उठाए गंभीर सवाल

बस्तर विस्थापन से लेकर जनगणना तक: छत्तीसगढ़ में सुलगती आदिवासी मांगें

रायपुर (पब्लिक फोरम)। 13 जुलाई 2026 से शुरू हो रहे छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र (Session) से ठीक पहले आदिनिवासी गण परिषद और ‘छत्तीसगढ़ आदिवासी विकास परिषद’ ने आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन और अस्तित्व से जुड़े गंभीर मुद्दे उठाए हैं। संगठन ने सरकार को घेरते हुए पूछा है कि क्या इस सत्र में उनके विस्थापन (Displacement), अवैध कब्जों और पहचान के संकट पर कोई ठोस चर्चा होगी?

सुलगते सवालों के घेरे में आगामी सत्र
छत्तीसगढ़ का बस्तर और उससे सटे जनजातीय इलाके लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच टकराव के गवाह रहे हैं। कल से शुरू होने वाले इस महत्वपूर्ण विधायी सत्र से ठीक पहले आदिवासियों द्वारा उठाए गए ये सवाल उनके भीतर पनप रहे गहरे असंतोष और तात्कालिक चिंताओं को रेखांकित करते हैं। परिषद ने स्पष्ट रूप से चार बुनियादी मांगों को सदन के पटल पर लाने और उन पर नीतिगत फैसले लेने की पुरजोर वकालत की है।
परिषद द्वारा रेखांकित किए गए मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं:
🔹 तुाएगोंदी-जामड़ीपाट अवैध कब्ज़ा: संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत संरक्षित आदिवासी जमीनों पर बाहरी तत्वों और कुछ व्यावसायिक हितों द्वारा किए जा रहे अवैध कब्जों का मामला इस समय बेहद गर्म है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी सहमति के बिना उनकी जमीनों को हड़पा जा रहा है।
🔹कोंडागांव पेनठाना मामला: ‘पेनठाना’ आदिवासियों के पारंपरिक और पवित्र देवस्थल होते हैं, जो उनकी सांस्कृतिक ,धरोहर का आधार हैं। कोंडागांव में इन आस्था के केंद्रों से जुड़े विवादों और उपेक्षा ने स्थानीय आदिवासी समाज को उद्वेलित कर रखा है।
🔹बस्तर में विस्थापन और विकास का द्वंद्व: बस्तर अंचल में ‘विकास’ के नाम पर बड़े पैमाने पर हो रहे बुनियादी ढांचा और खनन प्रोजेक्ट्स के कारण आदिवासियों को अपनी पैतृक भूमि छोड़नी पड़ रही है। उचित पुनर्वास के बिना किया जा रहा यह विस्थापन उनके सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।
🔹जनगणना 2027 में ‘आदिवासी धर्म’ कॉलम की मांग: आगामी जनगणना (Census) 2027 को ध्यान में रखते हुए मूलनिवासियों ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान की मांग तेज कर दी है। उनकी स्पष्ट मांग है कि जनगणना फॉर्म में ‘आदिवासी धर्म’ के लिए एक अलग कॉलम (Column – स्तंभ) होना चाहिए, ताकि उनकी विशिष्ट पहचान को आधिकारिक मान्यता मिल सके।

जमीनी हकीकत और प्रभावितों की आवाज
इस पूरे घटनाक्रम और औद्योगिक दबाव के बीच जी रहे बस्तर के स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता और विस्थापन से प्रभावित परिवार के मुखिया सोमनाथ मंडावी का दर्द इस संकट की गंभीरता को बयां करता है। उन्होंने सरकार और व्यवस्था से सवाल करते हुए कहा:
“हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन हमारी जल, जंगल और जमीन छीनकर हमें हमारे ही पूर्वजों की धरती पर बेघर कर देना कैसा विकास है? जब तक जनगणना में हमारी अलग धार्मिक पहचान दर्ज नहीं होगी और हमारे देवस्थलों को सुरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक हमारा अस्तित्व संकट में रहेगा। सरकार को इस सत्र में हमारी सुध लेनी ही होगी।”

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में पेसा (PESA) कानून और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर हमेशा से प्रशासनिक उदासीनता रही है। नीति निर्धारण में स्थानीय आदिवासियों की भागीदारी को हाशिए पर धकेल दिए जाने के कारण ही आज कोंडागांव से लेकर जामड़ीपाट तक असंतोष की आग सुलग रही है, जिसे अब राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है।

यह विधानसभा सत्र केवल राजनीतिक दांव-पेंच और आंकड़ों की बाजीगरी का मंच नहीं होना चाहिए, बल्कि यह प्रदेश के लाखों मूलनिवासियों के भविष्य और उनकी मानवीय गरिमा की कसौटी है। यदि सरकार इन बुनियादी मांगों को गंभीरता से लेते हुए सदन में चर्चा नहीं कराती, तो अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाने की यह लड़ाई आने वाले दिनों में सड़कों पर एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकती है।

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