कोरबा (पब्लिक फोरम)। कोयले की रोशनी से देश को ऊर्जा देने वाले कोरबा जिले के हजारों किसान आज खुद अँधेरे में हैं। जिनकी ज़मीन पर खनन हुआ, जिनके पुरखों के खेत खोदकर कोयला निकाला गया – वही किसान आज रोजगार और सम्मान की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। इसी पीड़ा को आवाज देते हुए ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति (UBKKS) ने एसईसीएल गेवरा क्षेत्र के मुख्य महाप्रबंधक को एक महत्वपूर्ण ज्ञापन सौंपा है, जिसमें विस्थापित किसान परिवारों के लिए टेंडरों में उचित भागीदारी और वैकल्पिक रोजगार की ठोस मांगें रखी गई हैं।
ज़मीन गई, रोज़गार भी छिना – अब कहाँ जाएँ?
समिति ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कोयला खनन परियोजनाओं की वजह से हजारों किसान परिवारों की पैतृक भूमि छिन चुकी है। खेती का आधार समाप्त होने के बाद ये परिवार जीविका के गंभीर संकट में हैं। समिति का तर्क है कि इन परिवारों को वैकल्पिक रोजगार देना केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि प्रबंधन की नैतिक जिम्मेदारी भी है।

पाँच लाख नहीं, बीस लाख चाहिए – टेंडर सीमा बढ़ाने की माँग
वर्तमान में भू-विस्थापितों और उनकी सहकारी समितियों के लिए सुरक्षित टेंडर की अनुमानित राशि मात्र “5 लाख रुपये” है, जो आज के बाजार भाव और काम की लागत को देखते हुए बेहद कम है। समिति ने माँग की है कि इस सीमा को बढ़ाकर कम से कम “20 लाख रुपये” किया जाए और “वार्षिक टेंडर सीमा को 5 करोड़ रुपये” तक विस्तारित किया जाए, ताकि विस्थापित परिवार वास्तविक और टिकाऊ आजीविका अर्जित कर सकें।
2018 का वादा भूला प्रबंधन – 20% आरक्षण फिर लागू हो
समिति ने वर्ष 2018 के एसईसीएल के आधिकारिक पत्र (SECL/BSP/CAD/642/FD) का हवाला देते हुए माँग की है कि कोल ट्रांसपोर्टेशन सहित सभी प्रकार के टेंडरों में स्थानीय भू-विस्थापित सहकारी समितियों के लिए 20% आरक्षण पुनः लागू किया जाए। समिति का आरोप है कि पहले जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे, उन्हें प्रबंधन द्वारा धीरे-धीरे वापस लिया जा रहा है और बड़े टेंडर जारी कर छोटे विस्थापितों को प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है।

फर्जी प्रमाणपत्रों का खेल – असली हकदार हो रहे वंचित
ज्ञापन में एक गंभीर चिंता यह भी जताई गई है कि कुछ “बाहरी और अपात्र व्यक्ति” भू-विस्थापितों के नाम पर बने प्रमाणपत्रों का दुरुपयोग करते हुए टेंडर प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं। इससे वास्तविक प्रभावित परिवार अपने ही हक से महरूम हो रहे हैं। समिति ने माँग की है कि ऐसे फर्जी लाभार्थियों को “ब्लैक लिस्ट” किया जाए और केवल वास्तविक परियोजना प्रभावित परिवारों को ही प्राथमिकता दी जाए।
60-73% कम दर पर टेंडर – गुणवत्ता और नीयत दोनों संदिग्ध
समिति ने एक और चौंकाने वाले तथ्य की ओर प्रबंधन का ध्यान खींचा है। कुछ टेंडर अनुमानित लागत से “60% से 73% तक कम दरों” पर स्वीकार किए जा रहे हैं। ऐसी असामान्य रूप से कम दरें न केवल कार्य की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं, बल्कि इनमें अनियमितता और भ्रष्टाचार की संभावना भी दर्शाती हैं। समिति ने इसकी उच्च स्तरीय जाँच की माँग की है।

CSR मद से मिले स्थायी रोज़गार
समिति ने यह भी माँग की है कि एसईसीएल अपने “CSR (कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व)” कोष का उपयोग करते हुए भू-विस्थापित परिवारों को कंपनी की कॉलोनियों और कार्यालयों में स्थायी आजीविका और स्वरोजगार के अवसर प्रदान करे, जिससे उन्हें दीर्घकालिक और सम्मानजनक जीवन जीने का मौका मिल सके।
संघर्ष की चेतावनी – अधिकार नहीं मिले तो आंदोलन अनिवार्य
समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने कहा कि संगठन ने वर्षों तक लड़ाई लड़कर एसईसीएल से कई अहम निर्णय करवाए हैं, लेकिन प्रबंधन उन्हें एक-एक कर पलट रहा है। उन्होंने चेतावनी दी – “यदि इन माँगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो विस्थापित परिवारों के पास अपने अधिकारों के लिए खुले संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।”
इस ज्ञापन की प्रति केंद्रीय कोयला मंत्री, स्थानीय सांसद-विधायकों और एसईसीएल के शीर्ष अधिकारियों को भी उचित कार्रवाई हेतु भेजी गई है। (ललित महिलांगे, मीडिया प्रभारी, ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति, की विज्ञप्ति पर आधारित)





Recent Comments