नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)| भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रसोई पर इस समय दोहरी मार पड़ रही है। देश के करोड़ों परिवारों का मासिक बजट अचानक गड़बड़ा गया है। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने समुद्र के रास्ते होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर मानसून की सुस्ती ने कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इन दोनों वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों के एक साथ सामने आने से देश में खाद्य वस्तुओं की किल्लत और महंगाई का संकट गहराने लगा है।
उपभोक्ता मामले विभाग के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की सोलह प्रमुख आवश्यक खाद्य वस्तुओं में से पंद्रह वस्तुओं यानी लगभग निन्यानवे प्रतिशत राशन सामग्री की कीमतों में सीधी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस समय सबसे ज्यादा असर रसोई के दो मुख्य स्तंभों यानी दालों और खाद्य तेलों पर दिखाई दे रहा है।
अगर हम बाजार के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो चना दाल की कीमत बयासी रुपये एक पैसे से बढ़कर छियासी रुपये छाछठ पैसे प्रति किलोग्राम हो चुकी है, जो लगभग पौने छह प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। इसी तरह अरहर दाल की औसत कीमत एक सौ सत्रह रुपये पचास पैसे से उछलकर एक सौ तेईस रुपये छियालीस पैसे प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई है। खाद्य तेलों की बात करें तो सरसों तेल की कीमत एक सौ अ्ठासी रुपये अट्ठासी पैसे से बढ़कर एक सौ छियानवे रुपये चवालिस पैसे प्रति लीटर हो गई है। मूंगफली तेल भी एक सौ सत्तानवे रुपये इक्यासी पैसे से बढ़कर दो सौ पांच रुपये तिहत्तर पैसे प्रति लीटर की दर पर बिक रहा है। इसके अलावा सोयाबीन और पाम ऑयल की कीमतों में भी लगभग साढे चार प्रतिशत का उछाल आया है।
केवल दाल और तेल ही नहीं, बल्कि दैनिक उपयोग की अन्य सामग्री भी महंगी हुई है। चीनी की कीमत सैंतालीस रुपये आठ पैसे से बढ़कर उनचास रुपये तैंतीस पैसे प्रति किलोग्राम हो गई है। दूध की कीमत अ्ठावन रुपये से बढ़कर इकसठ रुपये प्रति लीटर पहुंच चुकी है। नमक और चावल की दरों में भी चार प्रतिशत के आसपास की वृद्धि हुई है। राहत की बात केवल इतनी है कि गेहूं के आटे की कीमतों में महज आधा प्रतिशत का मामूली बदलाव आया है।
कीमतों में आए इस उबाल के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण काम कर रहे हैं। पहला कारण पश्चिम एशिया में उपजा कूटनीतिक और सैन्य संकट है। अमेरिका और ईरान के तनाव से लाल सागर और फारस की खाड़ी वाले व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए हैं। इस वजह से मालवाहक जहाजों को लंबे और जोखिम भरे रास्ते तय करने पड़ रहे हैं, जिससे नौवहन लागत और समुद्री बीमा प्रीमियम काफी बढ़ गया है। भारत अपनी जरूरत का साठ प्रतिशत खाद्य तेल बाहर से आयात करता है, इसलिए मालभाड़ा बढ़ते ही भारतीय बंदरगाहों पर तेल की लैंडिंग कॉस्ट काफी महंगी हो गई है।
दूसरा मुख्य कारण देश में मानसून का सुस्त और असमान रहना है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक जैसे प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में समय पर बारिश न होने से खरीफ सीजन की बुआई प्रभावित हुई है। शुरुआती रुझानों के मुताबिक दालों की बुआई के रकबे में लगभग सात प्रतिशत की कमी आई है। बुआई घटने से भविष्य में पैदावार कम होने की आशंका बढ़ गई है, जिससे वायदा बाजार में सट्टेबाजी और कीमतों पर दबाव तेजी से बढ़ा है।
तीसरा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों का चढ़ना है। इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे बड़े उत्पादक देशों ने उत्पादन घटने और अपनी निर्यात नीतियों में बदलाव के कारण दाम बढ़ा दिए हैं। भारत में खाद्य प्रसंस्करण, बेकरी और आम खाद्य तेलों के मिश्रण में पाम ऑयल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, इसलिए वैश्विक बाजार की इस तेजी का असर सीधे भारतीय बाजारों पर पड़ा है।
यह स्थिति इसलिए ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि देश में रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों का सिलसिला शुरू होने वाला है। इन पर्वों के दौरान मिठाइयों, नमकीन और पकवानों की मांग पच्चीस से चालीस प्रतिशत तक बढ़ जाती है। यदि आने वाले दिनों में मालभाड़े और बारिश के हालात में सुधार नहीं हुआ, तो यह महंगाई खुदरा बाजार में और उग्र रूप ले सकती है। इससे आम परिवारों के राशन बजट पर दस से बारह प्रतिशत का अतिरिक्त बोझ पड़ना लगभग तय माना जा रहा है।
इस परिस्थिति पर काबू पाने के लिए आर्थिक विशेषज्ञों ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाने का सुझाव दिया है। सरकार को तुरंत खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क और कृषि उपकर में अस्थायी राहत देनी चाहिए। इसके साथ ही नेफेड और भारतीय खाद्य निगम के पास मौजूद चने और अन्य अनाजों के बफर स्टॉक को तुरंत खुले बाजार में जारी किया जाना चाहिए। जमाखोरी और कृत्रिम किल्लत को रोकने के लिए थोक व्यापारियों और आयातकों के लिए स्टॉक लिमिट के नियमों को सख्ती से लागू करना बेहद जरूरी है।
महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला के इस गंभीर संकट पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि आने वाले त्योहारी सीजन में आम जनता का बजट पूरी तरह बिगड़ने वाला है या सरकार के कदम इसे संभाल लेंगे? अपने विचार, सुझाव और अनुभव हमें 750publicforum@gmail.com पर ईमेल करके जरूर भेजें।





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