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शुक्रवार, जनवरी 23, 2026
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रायगढ़ में संग्राम: ‘छद्म’ जनसुनवाई के खिलाफ 14 गांवों का ‘आर्थिक प्रहार’, अनिश्चितकालीन नाकेबंदी शुरू

रायगढ़/घरघोड़ा (पब्लिक फोरम)| विकास और विस्थापन के बीच का द्वंद एक बार फिर रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक में सड़कों पर उतर आया है। गारे पेलमा सेक्टर-1 की पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर उपजे विवाद ने अब एक उग्र आंदोलन का रूप ले लिया है। प्रशासन पर “धोखे” और “छद्म” सुनवाई का गंभीर आरोप लगाते हुए प्रभावित 14 गांवों के ग्रामीणों ने 12 दिसंबर से अनिश्चितकालीन ‘आर्थिक नाकेबंदी’ का ऐलान कर दिया है।

सी.एच.पी. चौक लिबरा में हजारों ग्रामीणों की मौजूदगी और भारी वाहनों के पहिए थम जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि यह लड़ाई अब केवल विरोध की नहीं, बल्कि अस्तित्व और आत्मसम्मान की है।

विश्वासघात का आरोप: क्या हुआ था 8 दिसंबर को?
इस पूरे विवाद की जड़ 8 दिसंबर 2025 को आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई है। ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि प्रशासन ने उनके साथ “विश्वासघात” किया है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, जनसुनवाई हाई स्कूल मैदान में होनी थी। हजारों ग्रामीण अपनी बात रखने के लिए वहां पहुंचे थे।

ग्राम पंचायत धौराभाठा और टांगरघाट के सरपंचों द्वारा जारी पत्र के अनुसार, प्रशासन ने आम जनता को गुमराह करते हुए सुनवाई को अन्यत्र आयोजित किया। आरोप है कि पुलिस बल का प्रयोग कर स्थानीय और प्रभावित जनता को सुनवाई स्थल तक जाने से रोका गया। वहीं, कंपनी के कर्मचारियों, ठेकेदारों और चुनिंदा समर्थकों को अंदर जाने की अनुमति दी गई, ताकि वे परियोजना के पक्ष में अपनी बात रख सकें। ग्रामीणों का कहना है कि यह “जनसुनवाई” नहीं, बल्कि बंद कमरे में किया गया एक “नाटक” था।

14 गांवों की हुंकार: जब तक न्याय नहीं, तब तक रास्ता नहीं
प्रशासन के इस रवैये से आक्रोशित होकर प्रभावित 14 गांवों की जनता ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। आज अनुविभागीय अधिकारी (SDO) घरघोड़ा को सौंपे गए ज्ञापन में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक 8 दिसंबर की विवादित जनसुनवाई को निरस्त नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

इस आंदोलन को “अनिश्चितकालीन आर्थिक नाकेबंदी” का नाम दिया गया है।इसके तहत:-
– व्यावसायिक वाहनों (कोयला परिवहन आदि) का चक्का जाम रहेगा।
– सी.एच.पी. चौक लिबरा को आंदोलन का मुख्य केंद्र बनाया गया है।
– ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस दौरान होने वाली किसी भी जन-धन की हानि के लिए शासन और प्रशासन पूर्ण रूप से जिम्मेदार होंगे।

लोकतंत्र की आवाज बनाम सिस्टम की खामोशी
यह घटना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता की भागीदारी पर उठते सवालों को रेखांकित करती है। जनसुनवाई का उद्देश्य ही होता है कि प्रभावितों का दर्द और उनकी आपत्तियां सुनी जाएं। लेकिन जब रक्षक ही रास्ता रोक दें, तो जनता के पास सड़क पर उतरने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता।

ग्राम पंचायत धौराभाठा और टांगरघाट के सरपंचों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन अब प्रशासन के लिए गले की फांस बन सकता है। एक तरफ ऊर्जा की जरूरतें और कोयला खनन है, तो दूसरी तरफ अपनी जमीन और पर्यावरण को बचाने की जिद लिए खड़े आदिवासी और किसान।

प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार
इस नाकेबंदी की सूचना अनुविभागीय अधिकारी के अलावा तहसीलदार तमनार और थाना प्रभारी तमनार को भी दी गई है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन ग्रामीणों की मांग मानकर जनसुनवाई को रद्द करता है, या फिर बल प्रयोग कर इस आवाज को दबाने की कोशिश की जाती है। फिलहाल, तमनार की फिजाओं में तनाव है और सड़कों पर ग्रामीणों का सैलाब।

यह आंदोलन महज एक रास्ता रोकने की घटना नहीं है, यह उस भरोसे के टूटने की आवाज है जो एक नागरिक अपने प्रशासन पर करता है। विकास आवश्यक है, लेकिन अगर उसकी नींव ‘छद्म’ और ‘अविश्वास’ पर रखी जाएगी, तो उसका परिणाम ऐसा ही जनाक्रोश होगा।
(रिपोर्ट: राघवेंद्र वैष्णव, ब्यूरो प्रमुख)

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