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गुरूवार, जनवरी 22, 2026
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BALCO में आर-पार की लड़ाई: 23 जनवरी से बड़े आंदोलन का शंखनाद; प्रबंधन को मिली आखिरी चेतावनी

कोरबा (पब्लिक फोरम)। एशिया के प्रमुख औद्योगिक प्रतिष्ठानों में गिने जाने वाले BALCO की नींव एक बार फिर श्रमिक असंतोष से हिलने को तैयार है। कंपनी प्रबंधन की कथित हठधर्मिता और श्रम कानूनों की लगातार अनदेखी ने कामगारों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। ‘अधिकार और न्याय’ की इस लड़ाई में भारतीय मजदूर संघ और बालको कर्मचारी संघ ने अब ‘करो या मरो’ की स्थिति अपनाते हुए 23 जनवरी 2026 से परसाभाठा गेट पर चरणबद्ध आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।

अल्टीमेटम: 22 जनवरी तक का समय, उसके बाद ‘संग्राम’
मजदूर संगठनों ने प्रशासन और प्रबंधन के सामने अपनी मंशा साफ कर दी है। जिला कलेक्टर और कारखाना निरीक्षक को भेजे गए एक कड़े पत्र में, भारतीय मजदूर संघ के जिला मंत्री नवरतन बरेठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संवाद के सभी रास्ते अब बंद होते दिख रहे हैं। उन्होंने प्रबंधन को 22 जनवरी तक का अंतिम समय (अल्टीमेटम) दिया है। यदि इस तिथि तक श्रमिकों की न्यायोचित मांगें नहीं मानी गईं, तो 23 जनवरी से होने वाले आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी बालको प्रबंधन की होगी।

कानून का मखौल और श्रमिकों की पीड़ा
यह मामला महज कुछ मांगों का नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक अधिकारों’ के हनन का है। श्रमिक संगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दे प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं:-

भेदभाव की दीवार: प्रबंधन पर आरोप है कि वह ‘बांटों और राज करो’ की नीति अपनाते हुए कुछ विशेष श्रमिक संगठनों को अनुचित लाभ दे रहा है। मंगल भवन का संचालन नियम विरुद्ध एक गुट को देना इसी पक्षपात का प्रमाण बताया जा रहा है।

लोकतंत्र की हत्या: औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 स्पष्ट कहता है कि वैधानिक समितियों का चुनाव अनिवार्य है, लेकिन बालको में यह प्रक्रिया ठंडे बस्ते में है।

रोजगार की असुरक्षा: सबसे बड़ा प्रश्न उन श्रमिकों का है जो वर्षों से खट रहे हैं। कानून कहता है कि छह माह की सेवा के बाद श्रमिक को स्थायी किया जाए, लेकिन यहाँ कामगार अनिश्चितता के साये में जीने को विवश हैं।

मानवीय संवेदना: ‘मौत की कीमत’ और ‘भूखे पेट’
इस आंदोलन का सबसे भावुक पहलू उन परिवारों का दर्द है जिन्होंने अपने कमाऊ सदस्यों को खो दिया है। संगठन ने मांग की है कि कार्य के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के आश्रितों को तत्काल अनुकंपा नियुक्ति और 1 करोड़ रुपये का मुआवजा मिले।

स्थानीय युवाओं का छलका दर्द
जनसुनवाई में किए गए लिखित वादों के बावजूद, स्थानीय बेरोजगार युवा आज भी नौकरी की आस में टकटकी लगाए बैठे हैं। बाहरी लोगों की भर्ती और स्थानीय प्रतिभा की उपेक्षा ने क्षेत्र में असंतोष की आग में घी डालने का काम किया है।

उच्च स्तर तक पहुंची बात
मामले की गंभीरता को देखते हुए, संघ ने अपनी आवाज केवल जिले तक सीमित नहीं रखी है। इसकी गूंज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, श्रम मंत्री, वेदांता समूह के चेयरमैन और पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारियों तक पहुंचा दी गई है।

अब गेंद प्रबंधन के पाले में
कोरबा की औद्योगिक शांति अब दांव पर है। 22 जनवरी की शाम ढलने के साथ ही यह तय हो जाएगा कि बालको प्रबंधन संवाद का रास्ता चुनता है या टकराव का। फिलहाल, श्रमिकों की निगाहें प्रबंधन के अगले कदम पर टिकी हैं, और हवाओं में आंदोलन की तपिश महसूस की जा सकती है।

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