भिलाई (पब्लिक फोरम)। अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) तथा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) भाकपा माले लिबरेशन के द्वारा प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारक और कवयित्री सावित्री बाई फुले की जयंती पर उनके त्याग व योगदान पर चर्चा करते हुए उन्हें स्मरण किया गया। साथ ही उनकी प्रमुख सहायिका और अभिन्न मित्र रहीं फातिमा शेख को भी याद किया गया।
इस अवसर पर भाकपा माले लिबरेशन के राज्य सचिव बृजेन्द्र तिवारी, बीएसडब्ल्यू (ऐक्टू) भिलाई के महासचिव श्याम लाल साहू, आइसा के प्रांतीय संयोजक डाॅ. दीक्षित भीमगढ़े, ऐक्टू भिलाई के अध्यक्ष अशोक मिरी एवं महिलाओं ने शिक्षा सहित ज्वलंत समस्याओं पर अपनी बात रखी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उस दौर में जो शक्तियां सावित्रीबाई और फातिमा शेख के खिलाफ खड़ी थीं, उनके उत्तराधिकारी आज भी समाज में सक्रिय हैं और महिला अधिकारों को कुचलने में लगे हुई हैं लेकिन आज महिलाएं अच्छी तरह जानती हैं कि ये वे पितृसत्तात्मक शक्तियां हैं जो महिलाओं पर अपना नियंत्रण रखने के लिए धर्म और संस्कृति का सहारा लेती हैं। इन तथाकथित धर्म रक्षकों को अपने समाज में होने वाली दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, देवदासी प्रथा, डायन के नाम पर हत्या जैसी अनेकानेक कुरीतियों से कोई फर्क नहीं पड़ता और उन्हें ये जायज ठहरा देते हैं लेकिन महिलाएं यदि शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक जीवन में बराबरी का अवसर, अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार या नागरिक अधिकारों की मांग करें तो इनका धर्म खतरे में पड़ जाता है और महिलाओं पर हिंसा की जाती है।
आज इन पितृसत्तात्मक शक्तियों की संरक्षक भाजपा की साम्प्रदायिक और फासीवादी सरकार केंद्र में है। इस सरकार के शासन काल में कानूनों में बदलाव कर लड़कियों के अपनी मर्जी से जीवन जीने के अधिकार को खत्म किया जा रहा है और मनुस्मृति को सही ठहराया जा रहा है जिसके अनुसार दलित और स्त्री को हमेशा अधीनता में रहना चाहिए। इसलिए आश्चर्य जनक नहीं है कि सरकार आशाराम, रामरहीम जैसे बलात्कारी बाबाओं और स्वामियों को संरक्षण देती है और भाजपा के नेता उनका आशीर्वाद लेते हैं।
यह सरकार सिर पर स्कार्फ बांधने वाली मुस्लिम लड़कियों का स्कूल कॉलेजों में प्रवेश रोक देती है और बिलकिस बानो के बलात्कारियों को संस्कारी ब्राह्मण बताकर जेल से रिहा कर देती है। सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर धारदार चाकू रखने और दुश्मनों का सिर काटने की बात करती है। ये लोग हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के बीच एक दीवार खड़ी कर देना चाहते हैं हमें इनकी चाल को समझने और इसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करने की जरूरत है। इस देश में अगर झांसी की रानी और बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में शहादत दी तो सावित्रीबाई और फातिमा शेख ने शिक्षा और समाज सुधार आंदोलन चलाया। साझी शहादत, साझी विरासत की इस परंपरा को हमें याद रखने की जरूरत है।
इस अवसर पर मीना डहरिया, सावित्री महिलांग, मीना कोसरे, राम बाई मरकाम, पाॅचो बाई बंजारे, मीना कौशिक, गिरजा बंजारे, मंजू कुर्रे, ईश्वरी बघेल, राधिका बघेल, बेबी कुर्रे, रंभा जोशी, मंजू कोसरे , किरण घृतलहरे, कीर्ति घृतलहरे, तजनीन बाई, चंदा बंजारे, गंगा बघेल, जूगरी टंडन, दीपक कुर्रे, अंजनी कुर्रे, दीनानाथ प्रसाद सहित बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित थीं।
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