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बालको वेदांता में भ्रष्टाचार का ‘सिंडिकेट’: जहां रसूखदारों का चलता है सिक्का, और पिसता है आम मजदूर

कोरबा (पब्लिक फोरम)। औद्योगिक नगरी कोरबा स्थित बालको-वेदांता (BALCO Vedanta) एक बार फिर अत्यंत गंभीर आरोपों के घेरे में है। कंपनी के भीतर नियुक्तियों, ट्रांसफर-पोस्टिंग और ठेका व्यवस्था में एक ऐसे शक्तिशाली ‘सिंडिकेट’ के पनपने की बात सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम को अपने आगोश में ले लिया है। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश के कद्दावर श्रम एवं उद्योग मंत्री के गृह जिले में, ठीक उनकी नाक के नीचे, आज भी पुराने राजनीतिक रसूखदारों का ही अघोषित फरमान लागू होता है। इस भ्रष्ट गठजोड़ का सबसे बड़ा खामियाजा वह आम मजदूर और युवा भुगत रहा है, जो अपनी योग्यता और ईमानदारी के बावजूद इस व्यवस्था के आगे खुद को लाचार और ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

नौकरियों की मंडी: योग्यता नहीं, ‘पर्ची’ और पैसा तय करता है भविष्य
बालको के भीतर यह चर्चा आम है कि कांग्रेस समर्थित यूनियन ‘इंटक’ के श्रमिक  नेताओं के इशारे के बिना कंपनी का एक पत्ता भी नहीं खड़कता। आरोप है कि कौन कर्मचारी कहां बैठेगा, किसका ट्रांसफर होगा और किसे नौकरी से निकाला जाएगा, यह सब इन्हीं नेताओं की पसंद-नापसंद पर निर्भर करता है।

कंपनी में नौकरी पाने की चाहत रखने वाले युवाओं के लिए योग्यता से ज्यादा ‘सिफारिश’ और ‘पैसे’ मायने रखते हैं। दावों के अनुसार, नियुक्ति के नाम पर प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये से अधिक की वसूली की जाती है, जिसमें बालको के कुछ चर्चित अधिकारियों का हिस्सा भी पहले से तय होता है। कुछ समय पहले इन नेताओं पर नौकरी लगाने के नाम पर रिश्वतखोरी की एफआईआर भी दर्ज हुई थी, लेकिन रसूख का नशा ऐसा है कि यह खेल आज भी बेखौफ जारी है।

यह स्थिति उस गरीब पिता के लिए किसी सदमे से कम नहीं है, जिसने अपना पेट काटकर बच्चे को इसलिए पढ़ाया था कि उसे एक प्रतिष्ठित कंपनी में सम्मानजनक नौकरी मिलेगी। लेकिन जब उसे पता चलता है कि बिना ‘चढ़ावे’ के यहां एंट्री मुमकिन नहीं, तो उसका पूरे सिस्टम से भरोसा उठ जाता है।

सत्ता बदली, पर नहीं बदला बालको का ‘कॉकस’
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि है। वर्तमान में राज्य में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। श्रम एवं उद्योग मंत्री इसी जिले से आते हैं। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि उनके सतत पर्यवेक्षण और प्रभाव के बावजूद, पूर्व मंत्री के संरक्षण में पनपा यह पुराना ढांचा आज भी कैसे सीना ताने खड़ा है? क्या इसे राजनीतिक दलों की मिलीभगत कहा जाए या वेदांता के उस खतरनाक शिकंजे का परिणाम, जिसने पिछले 25 वर्षों में सिस्टम की जड़ों को खोखला कर दिया है?

शोषण और संरक्षण का दोहरा मापदंड
बालको वेदांता के भीतर काम का माहौल दो अलग-अलग दुनिया में बंटा हुआ नजर आता है:-
विरोध करने वालों पर प्रताड़ना: जो भी ईमानदार कर्मचारी इस भ्रष्ट व्यवस्था या यूनियन के नेताओं के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे रातों-रात ट्रांसफर कर दिया जाता है या नौकरी से निकालने (टर्मिनेट) की धमकी दी जाती है। कुछ मामलों में तो कर्मचारियों से उनके आवास तक जबरन खाली कराए गए हैं।

कामचोरों को खुला संरक्षण: सूत्रों का दावा है कि यूनियन के करीबियों को बिना काम किए वेतन और सुविधाएं दी जा रही हैं। ये खास लोग केवल ‘पंचिंग’ करके अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और बाकी समय अपनी निजी या राजनीतिक गतिविधियों में मस्त रहते हैं।
ठेकों की बंदरबांट: किस ठेकेदार को काम मिलेगा और किस कंपनी में किस पार्टी के लोगों को लगाया जाएगा, यह सब पहले से फिक्स होता है।

जवाबदेही की कीमत चुकाता आम मजदूर
जब रसूखदार लोग बिना काम किए मौज काटते हैं, तो उत्पादन का सारा दबाव उन नियमित और ठेका मजदूरों पर आ गिरता है, जो अपनी रोजी-रोटी बचाने के डर से चुपचाप 8 से 12 घंटे पसीना बहाते हैं। अनुशासन और कार्रवाई का डंडा केवल कमजोरों पर चलता है। यह वेदांता प्रबंधन की नीयत, नैतिकता और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।

निष्पक्ष जांच की है दरकार
बालको का यह मामला सिर्फ आंतरिक गड़बड़ी या फाइलों की हेराफेरी तक सीमित नहीं है। यह उन हजारों मजदूरों की भावनाओं, उनके अधिकारों और उनके जीवन के साथ हो रहे क्रूर मजाक की कहानी है। एक तरफ कॉरपोरेट गवर्नेंस की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, और दूसरी तरफ एक ‘मैनेजमेंट चैनल’ के जरिए मजदूरों का शोषण किया जा रहा है।

डबल इंजन की सरकार और विशेषकर श्रम एवं उद्योग मंत्री को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए। एक निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्च स्तरीय जांच ही इस बात का पर्दाफाश कर सकती है कि इस सिंडिकेट की जड़ें कहां तक फैली हैं। यदि समय रहते इस कॉकस को नहीं तोड़ा गया, तो यह न केवल औद्योगिक शांति के लिए खतरा बनेगा, बल्कि आम आदमी के मन में यह धारणा हमेशा के लिए घर कर जाएगी कि ‘सिस्टम’ सिर्फ अमीरों और रसूखदारों की ही भाषा समझता है।

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