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उजड़ना भी कभी-कभी विकास कहलाता है!

(संपादकीय व्यंग्य आलेख)

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पत्रकारों ने वेदांता-बालको के सीईओ साहब से पूछा – “सर, संयंत्र के आसपास की सड़कें अब सड़कें नहीं, गड्ढों का कब्रिस्तान बन चुकी हैं। न रोशनी है, न मरम्मत। लोग रोज जान हथेली पर लेकर गुजरते हैं। यह जिम्मेदारी तो वेदांता प्रबंधन की है – फिर आप इन्हें बनवाते क्यों नहीं?”

CEO साहब हौले से मुस्कुराए – वही मुस्कान, जो हर सवाल को विज्ञापन में बदल देती है – “अरे यार, हम तो बजरंग चौक परसाभांठा से रिसदा चौक भदरापारा तक सड़क बनाने ही वाले हैं। और सुनिए – टू लेन नहीं, सीधे फोरलेन! ताकि पूरी दुनिया देखे कि यहाँ ‘विकास’ दौड़ रहा है। मगर ये लोग हैं कि मानते ही नहीं। हमारी पवित्र भावनाओं को कोई समझता ही नहीं।”

“ये छोटे-छोटे दुकानदार, ये बेचारे गरीब निवासी – बेवजह किसी के बहकावे में आकर विरोध पर उतर आए हैं। अरे भई, सड़क किनारे की जगह थोड़ी खाली कर दो, तो सबका भला है ना! अब आप लोग ही समझा दीजिए न इन्हें – कि उजड़ना भी कभी-कभी ‘विकास’ कहलाता है।” कारपोरेट जगत की “विकास वाली” ऐसी ऊंची-ऊंची बातें वेदांता वाले ही जाने। लेकिन इन गरीब-मेहनतकश सड़क के लोगों का क्या?

“पब्लिक फोरम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है!”

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