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गैर-स्वशासी क्षेत्रों के लोगों के साथ एकजुटता का अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह: आज़ादी की अधूरी दास्तान

संयुक्त राष्ट्र हर साल 25 से 31 मई तक उन लाखों लोगों की आवाज़ बनता है, जो आज भी औपनिवेशिक शासन की छाया में जी रहे हैं – यह सप्ताह उनके संघर्ष, उनकी उम्मीद और दुनिया की ज़िम्मेदारी का प्रतीक है।

नई दिल्ली/जिनेवा (पब्लिक फोरम)। दुनिया के नक्शे पर आज भी कुछ ऐसे धब्बे हैं जहाँ के लोग अपने भाग्य के खुद मालिक नहीं हैं। न अपनी सरकार चुन सकते हैं, न अपने संसाधनों पर अधिकार जता सकते हैं। इन्हीं लोगों के साथ वैश्विक एकजुटता प्रकट करने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रतिवर्ष 25 से 31 मई तक “गैर-स्वशासी क्षेत्रों के लोगों के साथ एकजुटता का अंतर्राष्ट्रीय सप्ताह” मनाता है।

क्या है गैर-स्वशासी क्षेत्र?

सरल शब्दों में कहें तो “गैर-स्वशासी क्षेत्र” वे भूभाग हैं जिनके निवासियों ने अब तक पूर्ण स्वशासन प्राप्त नहीं किया है। यानी वे किसी दूसरे देश या शक्ति के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं – उनकी अपनी कोई संप्रभु सरकार नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के “अध्याय 11” के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि इन क्षेत्रों पर शासन करने वाली प्रशासक शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे –
– वहाँ के निवासियों की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक उन्नति को बढ़ावा दें
– उन्हें स्वशासन विकसित करने में सहयोग दें
– उनके प्राकृतिक संसाधनों और मानवाधिकारों की रक्षा करें

सप्ताह की स्थापना: एक ऐतिहासिक संकल्प
यह सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प 54/91 (1999) द्वारा स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक एकजुटता नहीं, बल्कि इन क्षेत्रों को अंतर्राष्ट्रीय नैतिक और भौतिक सहायता दिलाना है – ताकि वहाँ के लोग एक दिन अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

इतिहास: औपनिवेशवाद से मुक्ति की लंबी राह
यह यात्रा बहुत लंबी और कठिन रही है –
– 1946 में संयुक्त राष्ट्र के आठ सदस्य देशों – ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका – ने “72 गैर-स्वशासी क्षेत्रों की पहली सूची” तैयार की थी। इनमें से आठ ने 1959 से पहले ही स्वतंत्रता हासिल कर ली।

– 21 क्षेत्रों के लिए सूचना का आदान-प्रदान बाद में बंद कर दिया गया – कुछ मामलों में महासभा की मंजूरी से (जैसे ग्रीनलैंड, अलास्का, हवाई) और कुछ में एकतरफा तरीके से।

– 1963 में संयुक्त राष्ट्र ने 1960 के उपनिवेशवाद-विरोधी घोषणापत्र के तहत इस सूची को संशोधित कर “64 क्षेत्रों” तक सीमित किया। बाद में फ्रांसीसी सोमालीलैंड (जिबूती), ओमान, कोमोरो द्वीप समूह और न्यू कैलेडोनिया को भी इसमें शामिल किया गया।

– 1960 से 2002 के बीच 54 क्षेत्र” स्वशासन प्राप्त करने में सफल रहे।

– आज भी 17 क्षेत्र” ऐसे हैं जहाँ के लोग पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं।

आँकड़ों के पीछे की ज़िंदगियाँ
जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र की नींव रखी गई, तब दुनिया भर में करीब 75 करोड़ लोग – यानी उस समय की विश्व आबादी का लगभग एक तिहाई – औपनिवेशिक शक्तियों के अधीन क्षेत्रों में रहते थे।

सोचिए – तीन में से एक इंसान का जीवन किसी और के हाथ में था। उसकी ज़मीन, उसके जंगल, उसके खनिज – सब पर किसी और का कब्ज़ा। वह न अपना नेता चुन सकता था, न अपना भविष्य।

आज उन 17 शेष गैर-स्वशासी क्षेत्रों में “20 लाख से भी कम लोग” औपनिवेशिक शासन के तले जी रहे हैं। संख्या भले छोटी हो, पर हर व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता का प्रश्न अनमोल है।

संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि
औपनिवेशिकता से मुक्ति की यह लहर – जिसने दशकों में विश्व का नक्शा बदल दिया – संयुक्त राष्ट्र की सबसे पहली और सबसे बड़ी ऐतिहासिक सफलता मानी जाती है। यह प्रमाण है कि जब दुनिया मिलकर किसी अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है, तो परिवर्तन संभव होता है।

यह सप्ताह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का अधिकार सार्वभौमिक है – यह किसी एक देश या नस्ल की जागीर नहीं। जब तक दुनिया में एक भी इंसान औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों में जकड़ा है, तब तक मानवता की यह ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होती।

25 से 31 मई का यह सप्ताह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं – यह उन लाखों लोगों के संघर्ष को वैश्विक मंच पर जिंदा रखने की कोशिश है जो आज भी अपनी आज़ादी का इंतजार कर रहे हैं।
– अखिलेश एडगर

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