रायपुर (पब्लिक फोरम)। छत्तीसगढ़ की राजधानी आज विरोध के स्वरों से गूँज उठी। केंद्र सरकार की नीतियों को ‘मजदूर विरोधी’ और ‘कॉर्पोरेट परस्त’ करार देते हुए दस राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनों और विभिन्न जन संगठनों ने संयुक्त रूप से ‘राष्ट्रीय आम हड़ताल’ का आह्वान किया। इस आंदोलन को संयुक्त किसान मोर्चा का भरपूर समर्थन मिला, जिसके चलते राजधानी के बाहरी इलाकों से लेकर मुख्य मार्गों तक किसानों और मजदूरों का अभूतपूर्व समन्वय देखने को मिला।
हक की लड़ाई: ‘मनरेगा’ की बहाली और ‘श्रम संहिताओं’ का विरोध
आंदोलन का मुख्य केंद्र बंगोली-मूरा रोड रहा, जहाँ छत्तीसगढ़ किसान महासभा और पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति के बैनर तले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों की दो टूक मांग है कि 29 पुराने श्रम कानूनों को खत्म कर लाई गई ‘चार श्रम संहिताओं’ को तुरंत रद्द किया जाए और पुराने कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए।
साथ ही, ग्रामीण रोजगार की रीढ़ माने जाने वाले ‘मनरेगा’ को समाप्त कर ‘विकसित भारत ग्राम जी योजना’ लागू करने के फैसले पर भी गहरा आक्रोश देखा गया। वक्ताओं ने इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रहार बताते हुए मनरेगा को तत्काल प्रभाव से पुनर्बहाल करने की मांग की।
विदेशी समझौतों और निजीकरण पर तीखा प्रहार
आंदोलन के दौरान केवल घरेलू नीतियां ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भी सवाल उठाए गए। किसान नेताओं ने केंद्र सरकार पर देश की संप्रभुता को ताक पर रखने का आरोप लगाते हुए कहा कि ‘भारत-अमेरिका कृषि व्यापार समझौता’ देश के डेयरी और कपास उत्पादक किसानों को बर्बादी की कगार पर खड़ा कर देगा। प्रदर्शनकारियों ने इस ‘बेमेल’ समझौते से भारत के बाहर निकलने की पुरजोर मांग की।
इसके अतिरिक्त, आगामी बीज विधेयक 2025, बिजली संशोधन विधेयक 2025 और शिक्षण संस्थान विधेयक 2025 को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई गईं। आंदोलनकारियों का मानना है कि:-
🔹इन विधेयकों के जरिए अंधाधुंध निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
🔹यह आम जनता, किसानों और मजदूरों की ‘आर्थिक आजादी’ पर सीधा खतरा है।
🔹शिक्षा और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को कॉर्पोरेट के हवाले करना आत्मघाती होगा।
जमीन से जुड़ी आवाजें
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ किसान महासभा के संयोजक नरोत्तम शर्मा, संरक्षक उधोराम वर्मा, और अध्यक्ष अनिल नायक ने एकजुटता का आह्वान किया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार इन ‘काले कानूनों’ को वापस नहीं लेती, यह संघर्ष थमेगा नहीं।
इस अवसर पर आलोक शुक्ला, विजय भाई, धनेश वर्मा, मोहन भारती, और बिसहत कुर्रे सहित भारी संख्या में किसान-मजदूर साथी उपस्थित थे, जिन्होंने अपनी उपस्थिति से इस लोकतांत्रिक प्रतिरोध को नई धार दी।





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