कोरबा/बालकोनगर (पब्लिक फोरम)। विकास के नाम पर खड़ी कंक्रीट की चिमनियां जब आस-पास की बस्तियों के लिए ‘काल’ बन जाएं, तो सब्र का बांध टूटना स्वाभाविक है। ऊर्जाधानी कोरबा के बालकोनगर स्थित शांति नगर में आज कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिला। बालको वेदांता कंपनी के 1200 मेगावाट पावर प्लांट के कूलिंग टॉवर से बरसती ‘प्रदूषण की राख’ और प्रबंधन की बेरुखी के खिलाफ स्थानीय निवासियों ने अब आर-पार की लड़ाई का शंखनाद कर दिया है।
शांति नगर संघर्ष समिति के नेतृत्व में आज (16 फरवरी 2026) से अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू हो गया है। यह आंदोलन केवल एक विरोध नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की पीड़ा है जो वर्षों से अपनी सांसों में जहर घोलने को मजबूर हैं।
धुएं के बीच जिंदगी और अनसुनी फरियाद
शांति नगर के निवासी लंबे समय से कूलिंग टॉवर से होने वाले प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। घरों की छतों से लेकर फेफड़ों तक, हर जगह बस राख और धूल है। समिति का आरोप है कि उन्होंने अनगिनत बार प्रबंधन और प्रशासन का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासन मिले। जब संवाद के सारे रास्ते बंद हो गए, तब जनता को विवश होकर आंदोलन की राह चुननी पड़ी।
8 सूत्रीय मांगें: हक की बात, अधिकार के साथ
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब समझौता नहीं, समाधान चाहिए। समिति ने अपनी 8 सूत्रीय मांगों को प्रशासन के पटल पर रखा है, जिनमें प्रमुख हैं:-
🔸प्रदूषित क्षेत्र से प्रभावित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास।
🔸स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी रोजगार की गारंटी।
🔸प्रदूषण से हुए नुकसान का उचित मुआवजा।
🔸बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और प्रदूषण पर तत्काल नियंत्रण।
🔸पुनर्वास एवं स्थायी रोजगार – यही हमारी एक पुकार
धरना स्थल पर गूंजता यह नारा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि शांति नगर की ‘जीने की जिजीविषा’ है। समिति ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे पीछे नहीं हटेंगे। यह लड़ाई अब सिर्फ़ सुविधाओं की नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और अस्तित्व को बचाने की है।
अब देखना यह होगा कि बालको प्रबंधन और जिला प्रशासन इस जन-आक्रोश को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर मुनाफे की मशीनें यूं ही शांति नगर की ‘शांति’ को निगलती रहेंगी।





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