वाराणसी से लेकर अमृतसर तक, निजीकरण की नई उड़ान और ‘चहेतों’ को सौंपने के सवाल
नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। देश में एक बार फिर ‘बिक्री’ की सुगबुगाहट तेज हो गई है। केंद्र सरकार और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने देश के 11 हवाई अड्डों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है। सरकारी फाइलों में इसे ‘एसेट मोनेटाइजेशन’ (संपत्ति मुद्रीकरण) का भारी-भरकम नाम दिया गया है, लेकिन सरल भाषा में कहें तो यह मुनाफे और घाटे वाले हवाई अड्डों का निजीकरण है। अप्रैल महीने में इन हवाई अड्डों के लिए बोलियां (Bids) मंगाई जा सकती हैं, जिससे सरकार का लक्ष्य करीब 6,000 करोड़ रुपये जुटाने का है।
कौन से एयरपोर्ट हैं लिस्ट में? (बड़े और छोटे का संगम)
इस बार सरकार की रणनीति थोड़ी अलग और दिलचस्प है। केवल मुनाफे वाले एयरपोर्ट नहीं बेचे जा रहे, बल्कि उनके साथ छोटे एयरपोर्ट्स को ‘क्लब’ (जोड़कर) किया गया है। यानी, अगर किसी कंपनी को मलाई खानी है, तो उसे साथ में सूखी रोटी भी खानी होगी। इस सूची में शामिल हैं:-
बड़े एयरपोर्ट: अमृतसर, वाराणसी, भुवनेश्वर, रायपुर और त्रिची (तिरुचिरापल्ली)।
छोटे/पेयर्ड एयरपोर्ट: कांगड़ा, हुबली, कुशीनगर, गया, छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) और तिरुपति।
योजना यह है कि वाराणसी जैसे मुनाफे वाले एयरपोर्ट के साथ कुशीनगर जैसे छोटे एयरपोर्ट को जोड़कर बोली लगाई जाएगी, ताकि छोटे शहरों की हवाई पट्टियां भी निजी निवेश के सहारे चल सकें।

‘एसेट मोनेटाइजेशन’ या महज ‘अडाणीकरण’?
खबर तो यह एक आर्थिक फैसला है, लेकिन इसके पीछे की कहानी और जनता के मन में उठते सवाल कुछ और ही इशारा कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश ने देखा है कि कैसे एक के बाद एक, देश के प्रतिष्ठित हवाई अड्डे एक ही समूह की झोली में जा गिरे हैं। मुंबई से लेकर गुवाहाटी तक, हवाई अड्डों के संचालन पर अब एक विशेष उद्योगपति का नाम चमकता है।
अब जब इन 11 नए एयरपोर्ट्स के लिए अप्रैल में बोलियां लगेंगी, तो बाजार के जानकारों और विपक्ष को रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि ‘बिड’ का ऊंट किस करवट बैठेगा। कहने को तो यह खुली निविदा होगी, पारदर्शी प्रक्रिया होगी, लेकिन दबी जुबान में हर कोई यही कह रहा है कि यह ‘निजीकरण’ कम और ‘अडाणीकरण’ का अगला चरण ज्यादा लग रहा है। सवाल यह है कि क्या इस दौड़ में कोई और खिलाड़ी टिक पाएगा?

आम आदमी पर क्या होगा असर?
आंकड़े और मुनाफे की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन इसका सीधा असर उस आम यात्री पर पड़ता है जो अपनी मेहनत की कमाई से हवाई टिकट खरीदता है।
सुविधाएं बनाम खर्चा: निजीकरण के बाद निश्चित तौर पर एयरपोर्ट्स चमचमाते नजर आते हैं, वॉशरूम साफ मिलते हैं और शॉपिंग आउटलेट्स बढ़ जाते हैं। लेकिन, इस चमक-धमक की कीमत यात्री को ही चुकानी पड़ती है।
महंगी होती यात्रा: अनुभव बताता है कि निजी हाथों में जाते ही ‘यूजर डेवलपमेंट फीस’ (UDF) में बढ़ोतरी होती है। एयरपोर्ट के अंदर मिलने वाली चाय और पानी की बोतल के दाम भी आसमान छूने लगते हैं।
भविष्य की तस्वीर: विकास या व्यापार?
सरकार का तर्क है कि इससे मिले पैसे का इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) को बेहतर बनाने में किया जाएगा, जो कि एक स्वागत योग्य कदम हो सकता है। लेकिन, लोकतंत्र में यह देखना भी जरूरी है कि देश की संपत्ति का विकेंद्रीकरण हो रहा है या वह सिमट कर कुछ चंद हाथों में जा रही है।
वाराणसी के घाटों से लेकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक जाने वाले श्रद्धालु और यात्री, अप्रैल में होने वाली इस नीलामी पर नजर गड़ाए बैठे हैं। देखना यह होगा कि यह सौदा देशहित में उड़ान भरता है या फिर यह महज एक और ‘कारपोरेट डील’ बनकर रह जाता है।





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