कोरबा (पब्लिक फोरम)। केंद्रीय बजट 2026 ने एक बार फिर देश के भू-विस्थापित किसानों और खेतिहर मजदूरों को गहरी निराशा में डाल दिया है। ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति ने इस बजट को दिशाहीन और संवेदनहीन करार देते हुए कहा है कि सरकार की प्राथमिकताओं में देश का अन्नदाता और अपनी जमीन गंवा चुका विस्थापित वर्ग कहीं नजर नहीं आता।
समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने तीखे शब्दों में कहा, “यह बजट सिर्फ कॉर्पोरेट घरानों की जेब भरने वाला है। जिन्होंने विकास के नाम पर अपनी जमीन गंवाई, उनके लिए इस बजट में कुछ भी नहीं है।”
रोजगार की गारंटी की मांग फिर ठुकराई
समिति की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि विस्थापित परिवारों के कम से कम एक सदस्य को पक्की सरकारी नौकरी देने की पुरानी मांग को एक बार फिर नजरअंदाज किया गया है। इसकी जगह बजट में कौशल विकास पर जोर दिया गया है, जिसे समिति निजी क्षेत्र के हितों की पूर्ति मानती है।
कुलदीप ने कहा, “कौशल विकास के नाम पर युवाओं को कम वेतन वाली असुरक्षित नौकरियों में धकेला जा रहा है। इससे सामाजिक सुरक्षा का अभाव और शोषण बढ़ेगा।”
मुआवजा फॉर्मूले में बदलाव की उम्मीद टूटी
बढ़ती महंगाई के इस दौर में भू-विस्थापितों को उम्मीद थी कि मुआवजे की गणना के फॉर्मूले में बड़ा बदलाव होगा। लेकिन बजट में इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साधी गई है। समिति का कहना है कि उचित मुआवजे के बिना किसान अपनी पुश्तैनी जमीन खोने के बाद आर्थिक बदहाली की ओर धकेले जा रहे हैं।
शिक्षा-स्वास्थ्य बजट में कटौती पर रोष
समिति ने स्कूली शिक्षा के आवंटन में कमी और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जगह निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने को आत्मघाती कदम बताया। “गरीब किसानों और उनके बच्चों के लिए महंगे निजी संस्थानों का खर्च उठाना नामुमकिन है। यह बजट उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित करने वाला साबित होगा,” कुलदीप ने कहा।
मनरेगा को खत्म करने की साजिश का आरोप
ग्रामीण रोजगार की रीढ़ मानी जाने वाली मनरेगा योजना के बजट में कटौती पर गहरी चिंता जताते हुए समिति ने आरोप लगाया कि सरकार इसे धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में बढ़ रही है। इसे पूरी तरह राज्यों के भरोसे छोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगा।
पर्यावरण पर भी खामोशी
औद्योगिकीकरण से बढ़ते पर्यावरणीय असंतुलन और प्रदूषण पर बजट में कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दिखी। भू-विस्थापित क्षेत्र पहले से ही गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं और सरकार की यह बेरुखी उनकी मुश्किलें और बढ़ाएगी।
समिति ने साफ किया है कि वह इस उपेक्षा के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना जारी रखेगी और जरूरत पड़ी तो आंदोलन का रास्ता भी अपनाएगी।





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