back to top
रविवार, फ़रवरी 1, 2026
होमआसपास-प्रदेशट्रेड यूनियन विकास में बाधा नहीं, बल्कि न्याय की नींव हैं: मुख्य...

ट्रेड यूनियन विकास में बाधा नहीं, बल्कि न्याय की नींव हैं: मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पर ऐक्टू ने जताई गहरी चिंता; कहा – यह मजदूरों के संघर्ष का अपमान है

नई दिल्ली/रायपुर (पब्लिक फोरम)। जब देश का एक आम मजदूर, जिसे दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती, इंसाफ की उम्मीद छोड़ देता है, तब उसकी नजरें देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की तरफ उठती हैं। लेकिन जब उसी अदालत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की ओर से मजदूरों के हकों के खिलाफ कोई बात कही जाए, तो यह न केवल निराशाजनक है, बल्कि चिंता का एक बड़ा विषय भी है।

हाल ही में, 29 जनवरी 2026 को घरेलू कामगारों के लिए कल्याणकारी उपायों की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई मौखिक टिप्पणियों ने एक नई बहस छेड़ दी है। इन टिप्पणियों पर ‘ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस’ (AICCTU) की छत्तीसगढ़ इकाई ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि सीजेआई के ये शब्द तथ्यों से परे हैं और देश के मेहनतकश वर्ग के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करते हैं।

क्या है पूरा मामला?

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कथित तौर पर सीजेआई ने टिप्पणी की कि ट्रेड यूनियनें औद्योगिक विकास में बाधा डालती हैं। इसके साथ ही, यह भी कहा गया कि ‘न्यूनतम वेतन’ तय करने से नियुक्ति प्रक्रियाओं में अड़चनें आती हैं।
इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए ऐक्टू के राज्य महासचिव बृजेन्द्र तिवारी ने कहा कि ये टिप्पणियां पूरी तरह से गैर-जरूरी हैं और सामाजिक न्याय की अवधारणा के विपरीत हैं। उन्होंने कहा, “जब न्यायपालिका के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति ऐसी बातें कहता है, तो इससे आम जनता और मजदूर वर्ग का भरोसा डगमगाता है।”

क्यों गलत है ट्रेड यूनियनों को जिम्मेदार ठहराना?

ऐक्टू ने अपने बयान में तथ्यों को सामने रखते हुए सीजेआई की टिप्पणी का सिलसिलेवार खंडन किया है:-
🔹कुप्रबंधन है असली वजह: संगठन का तर्क है कि उद्योगों के बंद होने के पीछे मजदूरों के आंदोलन नहीं, बल्कि प्रबंधन की नाकामी और फंड का गलत इस्तेमाल मुख्य कारण होता है। कई रिपोर्ट्स यह साबित कर चुकी हैं कि जहां यूनियनें मजबूत होती हैं, वहां कानून का पालन बेहतर तरीके से होता है।
🔹मजदूरों का एकमात्र सहारा: लेबर कोर्ट में आज भी मुकदमों के निपटारे में सालों लग जाते हैं। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट ही मजदूरों के लिए आखिरी उम्मीद बचता है। अगर वहां भी उन्हें “विकास में बाधक” माना जाएगा, तो वे कहां जाएंगे?
🔹इतिहास को न भूलें: आज अगर हमें 8 घंटे काम, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा (Social Security) जैसे अधिकार मिले हैं, तो यह किसी की दया नहीं, बल्कि ट्रेड यूनियनों के लंबे संघर्ष और कुर्बानियों का नतीजा है। इन संघर्षों के बिना, समाज में आज भी बंधुआ मजदूरी की प्रथा कायम रहती।

न्यूनतम वेतन पर सवाल: संविधान का उल्लंघन?

सीजेआई द्वारा न्यूनतम वेतन को नियुक्ति में बाधा बताने पर ऐक्टू ने संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं। संगठन ने याद दिलाया कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों में स्पष्ट किया है कि “न्यूनतम वेतन से कम पर काम करवाना, संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत ‘बेगार’ या जबरन मजदूरी के समान है।” ऐसे में, न्यूनतम वेतन पर सवाल उठाना खुद सुप्रीम कोर्ट के पुराने सिद्धांतों के खिलाफ जाता है।

आम आदमी पर असर और भविष्य की चिंता

यह मुद्दा केवल कानूनी बहस का नहीं, बल्कि करोड़ों मजदूरों की जिंदगी से जुड़ा है। आज जब सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर लेबर कोड्स में बदलाव कर रही है, तब न्यायपालिका से संरक्षण की उम्मीद की जाती है। ऐक्टू का आरोप है कि इस तरह की टिप्पणियां सरकार की मजदूर-विरोधी नीतियों को ही बढ़ावा देती हैं।

संगठन ने साफ किया है कि देश का मजदूर वर्ग चुप नहीं बैठेगा। आगामी 12 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा और ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाई गई देशव्यापी हड़ताल के जरिए मजदूर अपनी एकता और ताकत का प्रदर्शन करेंगे।

एक मानवीय अपील
अंत में, ऐक्टू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से अपील की है कि वे अपनी इन टिप्पणियों को वापस लें। एक लोकतांत्रिक देश में, जहां मजदूर अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उनके अधिकारों को ‘रुकावट’ मानना एक खतरनाक नज़रिया है। यह सिर्फ एक बयान का सवाल नहीं है, बल्कि उस भरोसे का सवाल है जो एक रिक्शा चलाने वाले, एक फैक्ट्री मजदूर और एक घरेलू कामगार का देश के संविधान पर है।
क्या न्याय का मतलब सिर्फ जीडीपी का आंकड़ा है, या उस आखिरी आदमी की मुस्कान भी, जो शाम को अपने बच्चों के लिए सम्मान की रोटी लेकर घर लौटना चाहता है? यह सवाल अब देश के सामने खड़ा है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments