नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। देश के शिक्षण संस्थानों में समानता और न्याय की उम्मीद को उस वक्त गहरा झटका लगा, जब 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की नई ‘इक्विटी नियमावली’ पर रोक लगा दी। कोर्ट ने इन नियमों को “अस्पष्ट” बताते हुए चिंता जताई कि क्या हम जातिविहीन समाज बनाने की बजाय पीछे की ओर जा रहे हैं? लेकिन, कोर्ट की इस टिप्पणी ने एक तीखी बहस छेड़ दी है। सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने इस फैसले को “संकीर्ण और विशेषाधिकार प्राप्त सोच” का नतीजा बताते हुए सवाल उठाया है कि क्या सिर्फ ‘जातिविहीन समाज’ कह देने भर से उन छात्रों को न्याय मिल जाएगा, जिन्होंने भेदभाव के चलते अपनी जान गंवा दी?
हकीकत बनाम आदर्शवाद: एक गहरा अंतर
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ये नियम दुरुपयोग का कारण बन सकते हैं और समाज को बांट सकते हैं। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने कोर्ट के नजरिए पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जाति और नस्लीय भेदभाव कोई पुरानी कहानी नहीं, बल्कि हमारे परिसरों की वो कड़वी सच्चाई है जिसका सामना दलित, आदिवासी और पिछड़े छात्र हर दिन करते हैं।
पार्टी ने अपने बयान में बेहद भावुक और तार्किक सवाल पूछा है- “क्या ‘जातिविहीन समाज’ शब्द बोल देने से रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की संस्थागत हत्याओं या एंजेल चकमा के साथ हुए नस्लीय अन्याय का हिसाब मिल जाएगा?” यह सवाल सिर्फ एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उन हज़ारों छात्रों का है जो अपनी पहचान की वजह से क्लासरूम से लेकर हॉस्टल तक प्रताड़ना झेलते हैं।
आंकड़े झूठ नहीं बोलते: 118% बढ़ा भेदभाव
सुप्रीम कोर्ट की चिंता के विपरीत, आंकड़े बताते हैं कि समस्या कम होने की बजाय विकराल होती जा रही है। यूजीसी के खुद के आंकड़ों पर गौर करें तो एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है:-
🔸बढ़ते मामले: साल 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118% की भारी वृद्धि हुई है।
🔸संस्थागत विफलता: ये आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा सिस्टम छात्रों को सुरक्षा देने में नाकाम रहा है।
सीपीआई (एमएल) का कहना है कि ये घटनाएं महज संयोग नहीं, बल्कि संस्थागत मिलीभगत का नतीजा हैं। यूजीसी के नए नियम दरअसल रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की माताओं द्वारा लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई और सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) का ही परिणाम थे, जिसे अब रोका जा रहा है।
यह न्याय है या विशेषाधिकार की रक्षा?
इस पूरे मामले में एक सामाजिक पहलू भी है। आलोचकों का मानना है कि जब भी वंचित तबकों को सुरक्षा देने के लिए कोई कानून बनता है, तो समाज का एक प्रभावशाली वर्ग उसे अपने ऊपर हमला मान लेता है। सीपीआई (एमएल) ने आरोप लगाया है कि यूजीसी के नियमों पर यह स्टे “ब्राह्मणवादी तत्वों के दबाव” और वर्चस्व बनाए रखने की मानसिकता का परिणाम है। यह विडंबना ही है कि समानता के उपायों को प्रभावशाली समूह अपने “उत्पीड़न” के रूप में पेश कर रहे हैं।
आखिरकार हम किस ओर जा रहे हैं?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी तकनीकताओं पर आधारित हो सकता है, लेकिन इसका मानवीय पक्ष बेहद संवेदनशील है। यह मामला सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि उन सपनों का भी है जो भेदभाव के बोझ तले कुचल दिए जाते हैं।
आज सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में एक ऐसा समाज बना पा रहे हैं जहाँ कोई छात्र अपनी जाति के कारण आत्महत्या न करे? सीपीआई (एमएल) ने देश के न्यायपसंद नागरिकों से अपील की है कि वे यूजीसी के इन नियमों का समर्थन करें। संविधान हमें न्याय, स्वतंत्रता और समानता का वादा करता है, और इस वादे को निभाने के लिए जरूरी है कि हम आंखें मूंदने की बजाय सच्चाई का सामना करें।
“आखिरकार, एक ‘जातिविहीन समाज’ का निर्माण हकीकत को स्वीकारने से होगा, उसे नकारने से नहीं।”





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