गुरूवार, जनवरी 29, 2026
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UGC Rules: दुरुपयोग की आशंका – सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए भेदभाव विरोधी नियमों पर लगाई रोक; जानिए छात्रों के लिए इसके मायने

नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में हलचल मचाने वाले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए भेदभाव विरोधी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने आज ‘ब्रेक’ लगा दिया है। यह मामला सिर्फ नियमों की कानूनी पेचीदगियों का नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य और परिसरों के माहौल से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की, CJI ने साफ शब्दों में कहा, “इन नियमों के गलत इस्तेमाल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।”
फिलहाल, शीर्ष अदालत ने इन नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी है।

मामला क्या है और कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने माना कि यह मुद्दा किसी एक कॉलेज या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर विश्वविद्यालय के छात्र पर पड़ेगा। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तत्काल और विस्तृत सुनवाई के लिए सहमति जताई है।

विरोध क्यों? सामान्य वर्ग को चिंताएं क्यों?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने जो दलीलें रखीं, वे काफी गंभीर हैं:-
उल्टा भेदभाव: दलील दी गई है कि भेदभाव मिटाने के नाम पर लाए गए ये नियम, सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों के साथ ही भेदभाव की वजह बन सकते हैं।
अस्पष्ट भाषा: नियमों की शब्दावली और प्रक्रिया इतनी गोलमोल है कि इसका इस्तेमाल किसी को भी निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
दोषी होने का ठप्पा: याचिकाकर्ता का कहना है कि नियमों का ढांचा ऐसा है जो बिना जांच के ही एक पक्ष को दोषी मानकर चलता है।

‘समानता समिति’ पर सबसे बड़ा सवाल
विवाद की जड़ UGC द्वारा अनिवार्य की गई ‘समानता समितियां’ (Equality Committees) हैं। नियमों के मुताबिक:- हर उच्च शिक्षण संस्थान को एक ऐसी समिति बनानी होगी।
इसमें ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाओं और दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व होना अनिवार्य है।

क्या है विवाद?

आलोचकों का तर्क है कि इस समिति में ‘सामान्य वर्ग’ के किसी प्रतिनिधि के लिए कोई जगह नहीं रखी गई। यह संरचना ऐसा संदेश देती है कि सामान्य वर्ग का छात्र हमेशा ‘शोषक’ है और बाकी सब ‘पीड़ित’। यह धारणा न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के खिलाफ है।

सरकार का पक्ष और मंत्री का भरोसा
इस पूरे विवाद के बीच, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की है। उन्होंने छात्रों को आश्वस्त किया है कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और सरकार सुनिश्चित करेगी कि किसी भी छात्र के साथ अन्याय न हो।

अब आगे क्या?
शिक्षा के मंदिर में जाति और वर्ग की दीवारें गिरनी ही चाहिए। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला यह तय करेगा कि भारतीय परिसरों में ‘समानता’ की परिभाषा क्या होगी और UGC को अपने नियमों में क्या बदलाव करना पड़ेगा।

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