नई दिल्ली (पब्लिक फोरम)। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी सैन्य हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस के कथित अपहरण के खिलाफ़ भारत की पांच प्रमुख वामपंथी पार्टियों ने एकजुट होकर कड़ी निंदा की है। संयुक्त बयान जारी करते हुए इन पार्टियों ने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन और एक संप्रभु राष्ट्र की स्वतंत्रता पर प्रहार करार दिया है। साथ ही देशभर में विरोध प्रदर्शनों का आह्वान किया गया है।
तेल भंडार पर कब्जे की मंशा साफ़
संयुक्त बयान में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण की बात कही, जिससे इस हमले के पीछे की असली नीयत उजागर हो गई है। यह केवल राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं, बल्कि आर्थिक साम्राज्यवाद का नंगा नाच है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार है, और यही इस हमले का असली कारण प्रतीत होता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने तो और आगे बढ़कर क्यूबा और मैक्सिको को अगले निशाने पर होने की धमकी तक दे डाली। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति 2025 के जारी होने के तुरंत बाद आए ये बयान साफ़ संकेत देते हैं कि अमेरिका पूरे पश्चिमी गोलार्ध को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है।

मोनरो सिद्धांत का नया अवतार
वामपंथी नेताओं ने इस हमले को 19वीं सदी के बदनाम मोनरो सिद्धांत के आधुनिक संस्करण की संज्ञा दी है। यह सिद्धांत अमेरिका को पूरे लैटिन अमेरिका में दखल देने का अधिकार देता था। आज की दुनिया में जहां संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात होती है, वहां यह रवैया किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
वेनेजुएला की जनता का प्रतिरोध
वेनेजुएला से आ रही खबरों से पता चलता है कि वहां की आम जनता अपने देश की आज़ादी और सम्मान के लिए सड़कों पर उतर आई है। हज़ारों की संख्या में लोग अमेरिकी हस्तक्षेप के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। यह उस देश की जनता का साहस और दृढ़ता दर्शाता है, जो बाहरी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं।

पांच वामपंथी दलों का संयुक्त मोर्चा
इस संयुक्त बयान पर सीपीआई(एम) के महासचिव एम ए बेबी, सीपीआई के महासचिव डी राजा, सीपीआई(एम-एल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, एआईएफबी के महासचिव जी देवराजन और आरएसपी के महासचिव मनोज भट्टाचार्य ने हस्ताक्षर किए हैं। यह एकता वामपंथी राजनीति में दुर्लभ है और मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करती है।
भारत सरकार से अपील
वामपंथी दलों ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिकी हमले की निंदा करने वाले देशों की आवाज़ में शामिल हो। भारत जैसे देश के लिए, जिसने स्वयं औपनिवेशिक शासन का दर्द झेला है और गुटनिरपेक्षता की परंपरा का वाहक रहा है, यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह छोटे और कमज़ोर देशों की संप्रभुता का समर्थन करे।

देशव्यापी विरोध का आह्वान
बयान में कहा गया है कि देशभर में अमेरिकी हमले के विरोध में और लैटिन अमेरिका के संघर्षरत लोगों के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। सभी शांतिप्रिय और साम्राज्यवाद विरोधी नागरिकों से बड़ी संख्या में इन प्रदर्शनों में शामिल होने की अपील की गई है।
यह घटना केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था का सवाल है जहां ताकतवर देश कमज़ोर देशों पर अपनी मर्जी थोप सकें। अगर आज वेनेजुएला पर हमला चुपचाप स्वीकार कर लिया जाए, तो कल कोई भी छोटा देश सुरक्षित नहीं रहेगा। यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवता और अंतरराष्ट्रीय कानून के अस्तित्व का प्रश्न है।
वेनेजुएला के आम नागरिक, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए खड़े हैं, हमें याद दिलाते हैं कि आज़ादी सबसे बड़ा मूल्य है। उनका संघर्ष हर उस इंसान का संघर्ष है जो न्याय, समानता और संप्रभुता में विश्वास करता है।





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