सवाल कैसे पूछें सरकार से?
लोकतंत्र में सरकार राजा नहीं होती, वह जनता की सेवक होती है। और सेवक से सवाल पूछना न अपराध है, न बदतमीज़ी – यह नागरिक का सबसे बुनियादी अधिकार और कर्तव्य है।
लेकिन असली समस्या यह है कि हम सवाल तो पूछना चाहते हैं, पर क्या पूछें, किससे पूछें और कैसे पूछें – यह नहीं जानते।
इसी भ्रम का फ़ायदा व्यवस्था उठाती है। लोग गुस्से में नारे लगाते रहते हैं, सोशल मीडिया पर लड़ते रहते हैं, लेकिन सत्ता सुरक्षित रहती है – क्योंकि सवाल सही जगह नहीं लगते।
यह लेख उसी उलझन को सुलझाने की एक ईमानदार कोशिश है – बिलकुल सरल भाषा में, आम आदमी की समझ और संवेदना के साथ।
क्यों ज़रूरी है सवाल पूछना?
अगर जनता सवाल न पूछे, तो सरकार मनमानी करने लगती है।
इतिहास गवाह है – जहाँ सवाल ख़त्म हुए, वहाँ अधिकार भी ख़त्म हो गए। सवाल सत्ता को याद दिलाता है कि:
“आप कुर्सी पर हमारे वोट से बैठे हैं, हमारे टैक्स से चलते हैं और हमारे भविष्य के लिए जिम्मेदार हैं।” चुप जनता, सबसे कमजोर जनता होती है।
सवाल किससे पूछें? – सही जिम्मेदार से
अक्सर हम ग़लत लोगों से सवाल पूछ लेते हैं। इससे असली जिम्मेदार बच निकलते हैं।
बेरोज़गारी → केंद्र की आर्थिक नीति।
स्कूल बंद → शिक्षा विभाग।
अस्पताल में डॉक्टर नहीं → स्वास्थ्य प्रशासन।
आदिवासी विस्थापन → सरकार + कॉरपोरेट समझौते।
सही सवाल वही है जो सही दरवाज़े पर दस्तक दे।

सवाल क्या पूछें? – घटना नहीं, कारण
हम ज़्यादातर घटनाओं पर सवाल करते हैं: “आज फिर बिजली चली गई?” “सड़क क्यों टूटी है?”
लेकिन सरकार को सबसे ज़्यादा डर लगता है कारण पूछने से।
बेहतर सवाल होगा: “बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए पिछले पाँच साल में क्या किया गया?”
“सड़क निर्माण में ठेकेदार और इंजीनियर की जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई?” घटना सरकार छुपा सकती है, कारण नहीं।
व्यक्ति नहीं, व्यवस्था से सवाल कीजिए
नेता आते-जाते रहते हैं। व्यवस्था वही रहती है। इसलिए सवाल ऐसे न हों:
“इस मंत्री ने यह क्यों कहा?”
बल्कि ऐसे हों: “इस विभाग की नीति आम जनता को नुकसान क्यों पहुँचा रही है?” व्यक्ति पर सवाल सत्ता को मौका देता है।
व्यवस्था पर सवाल सत्ता को मजबूर करता है।
गुस्से से नहीं, सच्चाई से पूछिए
गाली सरकार को नहीं डराती। नारा सरकार को नहीं हिलाता। तथ्य और सच्चाई डराते हैं।
कमज़ोर सवाल:
“सरकार कुछ नहीं कर रही!”
मज़बूत सवाल:
“सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गारी बढ़ी है, इसका समाधान क्या है?” शांत सवाल, सबसे तीखा हथियार होता है।

सवाल में आँकड़े जोड़िए
आँकड़ा सत्ता की कमजोरी उजागर करता है। जैसे: “शिक्षा बजट घटा या बढ़ा?” “कितने स्कूल बंद हुए?” “कितने अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं?”
जब सवाल संख्या के साथ होता है, तो सरकार गोलमोल जवाब नहीं दे पाती।
सबसे ज़रूरी सवाल – किसके फायदे में?
हर नीति, हर कानून, हर फैसला इस सवाल पर परखिए:
“इससे फायदा किसे हुआ?”
अगर फायदा: बड़े उद्योगपतियों को → सवाल उठाइए।
गरीब, किसान, मजदूर को → समर्थन कीजिए।
यही सवाल सत्ता को सबसे असहज करता है।
गरीब, महिला, आदिवासी, दलित, मजदूर को केंद्र में रखिए
सच्चा लोकतंत्र वही है जो आख़िरी आदमी तक पहुँचे। इसलिए सवाल पूछिए:
“आदिवासी ज़मीन क्यों छीनी गई?”
“मजदूर की मजदूरी क्यों नहीं बढ़ी?”
“गरीब का राशन क्यों रोका गया?”
“इसमें महिला का अधिकार और सम्मान कहां है?” जो सवाल कमजोर के पक्ष में होता है, वही नैतिक सवाल होता है।
सवाल का उद्देश्य क्या हो? – समाधान
सवाल सिर्फ दोष निकालने के लिए नहीं होता। सवाल का मकसद होना चाहिए – हल निकालना। अच्छा सवाल: “इस समस्या को ठीक करने के लिए सरकार की योजना क्या है?” जब समाधान पूछा जाता है, तब जवाबदेही शुरू होती है।
अकेले नहीं, मिलकर पूछिए
अकेला सवाल दबाया जा सकता है। सामूहिक सवाल दबाए नहीं जा सकते।
गाँव में → सामूहिक ज्ञापन।
शहर में → नागरिक मंच।
ऑनलाइन → संगठित अभियान।
सामूहिक सवाल सत्ता की नींद उड़ाता है।

वोट भी सवाल है – सबसे बड़ा
चुनाव सिर्फ सरकार बदलने का नहीं, सवाल पूछने का मौका होता है।
वोट डालते समय पूछिए:
“पिछली बार क्या किया?”
“अगली बार क्या करोगे?”
बिना सवाल का वोट देना, लोकतंत्र को खोखला कर देता है। सबसे खतरनाक स्थिति – जब सवाल ही मर जाएँ।
जिस दिन जनता कह दे – “कुछ नहीं बदलेगा”, उस दिन सत्ता जीत जाती है।
याद रखिए: लोकतंत्र मरता नहीं है, उसे धीरे-धीरे चुप करा दिया जाता है।
समझाइए सरकार को
सरकार को समझाने के लिए
न हिंसा चाहिए, न नफरत, न अंधी भीड़।
ज़रूरत है: सही सवाल, सही भाषा, सही जगह और सामूहिक आवाज़। सवाल पूछते रहिए। क्योंकि सवाल जीवित हैं, तो लोकतंत्र जीवित है।





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