शुक्रवार, मार्च 6, 2026
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बालको विवाद के 25 साल: क्या दांव पर केवल 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है या छत्तीसगढ़ के हजारों परिवारों का भविष्य भी?

कोरबा जिले के विकास की एक अधूरी कहानी: BALCO विवाद अभी भी अदालत में जिंदा

वर्ष 2001 में जब भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी उद्योगपति अनिल अग्रवाल की कंपनी को सौंपी गई थी, तो इसे देश में आर्थिक सुधारों का एक बड़ा और साहसी कदम बताया गया था। दावा था कि निजीकरण से उत्पादन बढ़ेगा और देश को एक मजबूत एल्युमिनियम दिग्गज मिलेगा। लेकिन, 25 साल बाद आज यह केवल एक कॉरपोरेट सौदे का विवाद नहीं रह गया है। 16 फरवरी 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) में हुई ताजा सुनवाई ने उस सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है- बालको की शेष 49 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी का भविष्य क्या होगा? क्या यह वेदांता समूह के खाते में चली जाएगी, या इस सार्वजनिक संपत्ति पर देश का हक भी बरकरार रहेगा?

यह कहानी सिर्फ बोर्डरूम की फाइलों और अदालत के चक्करों की नहीं है। यह कहानी उन हजारों कर्मचारियों के टूटे सपनों और कोरबा जिले के आम आदमी और उस आदिवासी की भी है, जिसकी जिंदगी बालको के इर्द-गिर्द घूमती है।

कहानी की शुरुआत: 51 प्रतिशत से पूर्ण स्वामित्व की ओर कदम
तारीख थी 2 मार्च 2001। भारत सरकार ने रणनीतिक विनिवेश के तहत बाल्को की 51% हिस्सेदारी स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड (जो अब वेदांता लिमिटेड है) को 551 करोड़ रुपये में बेच दी। इस सौदे के साथ ही कंपनी का वास्तविक नियंत्रण, फैसले लेने की ताकत और रणनीतिक दिशा पूरी तरह से निजी हाथों में चली गई। केवल कागजों पर सरकार 49% की भागीदार जरूर रही, लेकिन संतुलन बदल चुका था।

इसी समझौते में एक पेंच था- ‘क्लॉज 5.8’ यानी ‘कॉल ऑप्शन’ (Call Option)। इसका मतलब था कि तीन साल बाद निजी कंपनी को बची हुई 49% हिस्सेदारी खरीदने का अधिकार होगा। साल 2004 में वेदांता समूह ने इस हिस्सेदारी को खरीदने के लिए 1,099 करोड़ रुपये की पेशकश की। लेकिन, साल 2006 आते-आते सत्ता बदल चुकी थी। यूपीए-1 सरकार ने इस पर आपत्ति जताई और हिस्सेदारी बेचने से इनकार कर दिया। ‘कैग’ (CAG) ने भी अपनी रिपोर्ट में माना था कि इस सौदे की कीमत कम आंकी गई है।

अदालती लड़ाई: जब ‘कॉल ऑप्शन’ पर उठे सवाल
सरकार के इनकार के बाद अनिल अग्रवाल की कंपनी ने मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का रास्ता चुना। लेकिन कानूनी राह अब इतनी आसान नहीं थी:-

🔹25 जनवरी 2011: ट्रिब्यूनल के बहुमत निर्णय ने कहा कि इस तरह के समझौते से सार्वजनिक कंपनी के मूल स्वरूप पर असर पड़ता है, जिससे ‘कॉल ऑप्शन’ पर गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो गए।

🔹8 अक्टूबर 2025: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में ‘क्लॉज 5.8’ को शून्य (Void) घोषित कर दिया। यह अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता के उस दावे पर सीधा प्रहार था, जिसके सहारे वे 49% हिस्सेदारी मांग रहे थे।

🔹16 फरवरी 2026: कंपनी ने अपील दायर की, जिस पर डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। फिलहाल मामला जीवित है और अदालत ने समझौते के रास्ते भी खुले रखे हैं।

इलेक्टोरल बॉन्ड और पारदर्शिता पर उठते सवाल
जब बात एक रणनीतिक सार्वजनिक संपत्ति की हो, तो सवाल कड़े होने लाजमी हैं। सार्वजनिक डोमेन में मौजूद इलेक्टोरल बॉन्ड के आंकड़ों में वेदांता समूह से जुड़ी कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे का भी जिक्र है। जब कोई कॉरपोरेट समूह एक तरफ सरकारी संपत्ति के विवाद में पक्षकार हो और दूसरी तरफ राजनीतिक चंदा देने वालों की सूची में शामिल हो, तो आम जनता के मन में पारदर्शिता को लेकर शंकाएं जन्म लेती हैं।

मजदूरों का क्या हुआ? एक मानवीय त्रासदी
अदालत और कॉरपोरेट के इस भारी-भरकम विवाद के बीच असली इंसान कहीं खो गया है। साल 2001 के विनिवेश समझौते में कर्मचारियों के हितों की रक्षा का वादा किया गया था। यह भी चर्चा थी कि 5% शेयर भी कर्मचारियों को दिए जाएंगे।

आज 25 साल बाद बालको की सच्चाई यह है कि वहां एक हजार से भी कम नियमित (रेगुलर) कर्मचारी बचे हैं। बाकी पूरा ढांचा ठेका मजदूरों के कंधों पर टिका है। इन कर्मचारियों को न तो अनिल अग्रवाल की कंपनी ने कभी मुनाफे का साझीदार बनाया और न ही सरकार ने उनके हक के लिए कोई मजबूत आवाज उठाई।

क्या अब 25 साल बाद कर्मचारियों को शेयर देने का वादा पूरा होगा? क्या उनकी सामाजिक सुरक्षा बची रहेगी? कर्मचारी किसी कॉरपोरेट विवाद का मामूली हिस्सा नहीं हो सकते, वे तो इस कंपनी की आत्मा हैं।

कोरबा की सांसों और विकास का सवाल
बालको सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं है; यह छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर की अर्थव्यवस्था की धुरी है। लेकिन पिछले कुछ सालों में राखड़ (ऐश) प्रबंधन, पर्यावरण की अनदेखी, स्थानीय युवाओं को रोजगार न मिलने और सीएसआर (CSR) फंड के सही इस्तेमाल पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

जब हम 49% हिस्सेदारी के मूल्यांकन की बात करते हैं, तो यह सिर्फ ऐतिहासिक शर्तों या शेयर बाजार के गणित का मामला नहीं है। यह एक शहर के पर्यावरण, वहां के लोगों के स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का मूल्यांकन भी है।

अब आगे क्या?
फिलहाल ‘कॉल ऑप्शन’ कानूनी रूप से शून्य है, लेकिन अपील जारी है। यह लड़ाई अब सिर्फ निजीकरण बनाम सरकारी नियंत्रण की नहीं रह गई है। यह देश की सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा बनाम एक उद्योगपति की अति महत्वाकांक्षा की अग्निपरीक्षा भी है।

“क्या 25 साल पहले अनिल अग्रवाल के द्वारा बालको का 51% हिस्सेदारी पर कब्जा कर लेना, पूर्ण रुपेण कब्जे की रणनीति का पहला कदम था? क्या अदालत की चौखट पर जनता के हक की जीत होगी या कॉरपोरेट कूटनीति सफल हो जाएगी? फैसला जो भी हो, उसमें फाइलों के पन्नों से ज्यादा, कोरबा जिले के उन आम लोगों और मजदूरों की आवाज सुनी जानी चाहिए, जिन्होंने इस कंपनी को अपने खून-पसीने से सींचा है। देश भर की नजरें अब अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।”

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