किसके दबाव में किए गए गैर कानूनी स्थानांतरण? जांच जरूरीतकनीकी कर्मियों को भेजा मार्केटिंग में।
तकनीकी कर्मियों को भेजा मार्केटिंग में।
कोरबा। (पब्लिक फोरम)। बालको – वेदांता के मानव संसाधन विभाग के अधिकारी श्रमिक संघों के अंदरूनी मामलों में दखल दे कर कंपनी और मालिक को मुसीबत में तो नहीं डाल रहे? पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई कर्मचारियों, विशेषकर विभिन्न श्रमिक यूनियनों के पदाधिकारियों को दूरस्थ अथवा बंद पड़े प्लांटों में स्थानांतरित किए जाने के मामलों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। प्रभावित कर्मचारियों का आरोप है कि उनके स्थानांतरण का कारण कंपनी की प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, और ना ही कम्पनी के प्रावधानों के अंतर्गत आने वाला कोई मिस कंडक्ट था, बल्कि हमारी खुद की श्रमिक संघ इंटक के ऐसे कई आंतरिक मामले थे जो सीधे तौर पर संगठन के नेतृत्व की गलत नीतियों के विरोध से जुड़े थे।
जानकारी के अनुसार, परेश बैरागी, नरेंद्र तिवारी, दिनेश सिंह, पंकज सोनी भी इंटक से जुड़े थे। इन तमाम कर्मचारियों ने अपने यूनियन के भीतर रह कर उन मामलों को गंभीरता से देखा और समझा जो सिर्फ अपने ही संगठन के एक राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी के एकतरफा निर्णयों से प्रभावित थे और इससे संयंत्र के बाकी श्रमिकों को काफी नुकसान हो रहा था। उनके द्वारा कर्मचारी हित में कई गलत निर्णय लिये जा रहे थे । जिससे कर्मचारी हित प्रभावित हो रहे थे। वहीं संघ (इंटक ) में सदस्यता, यूनियन के अन्य पदाधिकारियों से भेदभाव, उन्हे नीचा दिखाते हुवे ज़लील करना, आर्थिक अनियमितताओं के कूटरचित दस्तावेज और शासन के संबंधित विभागों में गलत जानकारी एवं दस्तावेज प्रस्तुत करने के अलावा वर्तमान महासचिव को बतौर कठपुतली की तरह इस्तेमाल करना और महासचिव का कठपुतली की तरह इस्तेमाल होना। ऐसे कई अहम मुद्दे थे जिन पर संगठन के इन सदस्यों द्वारा विरोध और शिकायतें की जाती थी।उनके द्वारा कर्मचारी हित में कई गलत निर्णय लिये जा रहे थे । जिससे कर्मचारी हित प्रभावित हो रहे थे। वहीं संघ (इंटक ) में सदस्यता, यूनियन के अन्य पदाधिकारियों से भेदभाव, उन्हे नीचा दिखाते हुवे ज़लील करना, आर्थिक अनियमितताओं के कूटरचित दस्तावेज और शासन के संबंधित विभागों में गलत जानकारी एवं दस्तावेज प्रस्तुत करने के अलावा वर्तमान महासचिव को बतौर कठपुतली की तरह इस्तेमाल करना और महासचिव का कठपुतली की तरह इस्तेमाल होना। ऐसे कई अहम मुद्दे थे जिन पर संगठन के इन सदस्यों द्वारा विरोध और शिकायतें की जाती थी।
दरअसल प्रदेश की सरकारें अक्सर अपने हितों के लिए कानून में बदलाव करती रहती हैं। पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार ने संख्या के आधार पर श्रमिक संगठनों को मान्यता का हक दिया और यहां के उद्योगों में आईआर एक्ट लागू कर दिया, जिसके तहत बालकों वेदांता जैसी कंपनियों को अपने प्रत्येक निर्णय, या नीति लागू करने पर केवल मान्यता प्राप्त श्रमिक संघ से वार्ता करने को अनिवार्य कर दिया। जाहिर है इंटक को सबसे बड़े श्रमिक संगठन का दर्जा मिला, लिहाजा वेदांता प्रबंधन ने भी श्रमिक हितों और उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा और निर्णय लेने के लिए चर्चा के टेबल पर इंटक को बैठाया । बताया जाता है कि यूनियन के वही राष्ट्रीय पदाधिकारी अपने तरीके से इंटक के भीतर के खुद के विरोधियों को निपटा ते रहे और प्रबंधन उन्हीं के इशारे पर नियम विरुद्ध स्थानांतरण करता रहा।
परेश बैरागी जो कई वर्षों तक इंटक के सक्रिय सदस्य रहे उन्हें जुलाई 2022 में वर्षों से बंद पड़ी विधानबाग इकाई में स्थानांतरित कर दिया गया। बताया जाता है कि उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी देकर वहां ज्वाइन करने के लिए मजबूर किया गया। इंटक से असंतुष्ट होने के बाद इन्होंने सीटू ज्वाइन किया और इंटक के वरिष्ठ पदाधिकारी के कथित गलत कार्यों का लगातार विरोध करते रहे।
इसी तरह नरेंद्र तिवारी को जो संघ के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे इंटक के वरिष्ठ पदाधिकारी के दबाव में कंपनी ने दिसंबर 2022 में मार्केटिंग विभाग बेंगलुरु में स्थानांतरित कर दिया , जिसे तात्कालीन कोरबा कलेक्टर ने गलत बताते हुवे ट्रांसफर निरस्त कर दिया था। बावजूद इसके वेदांता ने पुनः दबाव में वेतन रोक कर इन्हें बर्रा में उपस्थिति देने को मजबूर किया।
दिनेश सिंह को नया यूनियन बनाने के कारण बेंगलुरु स्थानांतरित कर कर दिया गया था, किंतु भारी दबाव के बीच 6 महीने बाद उनकी वापसी कर दी गई।
ठीक इसी तरह इंटक यूनियन के सक्रिय सदस्य रहे पंकज सोनी को भी इन्हीं परिस्थितियों के चलते बेंगलुरु भेजा गया ।
इसी क्रम में 13 जुलाई 2026 को एटक के महामंत्री सुनील सिंह को इंटक द्वारा किए गए वेतन समझौते का विरोध करने के कारण बंद इकाई विधानबाग स्थानांतरित किये जाने की भी खबर है जिस पर कर्मी का विरोध जारी है ।
यहां जानकारों का यह पक्ष भी रखना जरूरी है जो बताता है कि पूर्व में ठेका श्रमिकों का जो वेज़ रिवीजन श्रमिक नेता संजीव शर्मा और अन्य यूनियन के द्वारा कराया गया था, वह श्रमिकों के लिए बहुत लाभदायक था जो ठेका श्रमिकों को लगभग 12 – 13 प्रतिशत लाभ देता था, जिसे मान्यता प्राप्त यूनियन ने लगभग 6 से 8 प्रतिशत पर कर दिया और कई सुविधाओं में भी कटौती की गई इस विषय पर आगे एक विस्तृत चर्चा और रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी क्योंकि कुछ ही माह में मजदूरों का अगला वेज रिवीजन होगा जो संयुक्त श्रमिक संघों के माध्यम से होगा और कंपनी के लिए चुनौती पूर्ण भी होगा।

श्रमिक संघ BMS से संबद्ध यूनियन BKS के सक्रिय सदस्य हरीश सोनवानी को भी इसी तरह रीजनल मार्केटिंग ऑफिस बेंगलुरु भेजा गया।यहां ये बात काबिले गौर करने की है कि ये सभी स्थानांतरित किए गए कर्मचारी टेक्निकल हैं, और इन्हें नॉन टेक्निकल कार्यों के लिए स्थानांतरित किया गया। अब सवाल ये उठता है कि टेक्निकल कर्मचारी नॉन टेक्निकल विभाग में क्या करेगा, उसे क्यों और किस आधार पर भेजा जा रहा है? क्या कंपनी द्वारा टेक्निकल कर्मचारियों को मार्केटिंग अथवा मल्टीपल टास्क की टर्निंग दी गई है? यदि नहीं तो इनकी कार्यदक्षता का आंकलन किस पैमाने पर किया जाएगा, जो पदोन्नति वेतन वृद्धि जैसे मामलों के लिए निहायत जरूरी है।
यहां ये बात काबिले गौर है कि ये सभी स्थानांतरित किए गए कर्मचारी टेक्निकल हैं, और इन्हें नॉन टेक्निकल कार्यों के लिए स्थानांतरित किया गया। अब सवाल ये उठता है कि टेक्निकल कर्मचारी नॉन टेक्निकल विभाग में क्या करेगा, उसे क्यों और किस आधार पर भेजा जा रहा है? क्या कंपनी द्वारा टेक्निकल कर्मचारियों को मार्केटिंग अथवा नॉन टेकनिकल मल्टीपल टास्क की ट्रेनिंग दी गई है? यदि नहीं तो इनकी कार्यदक्षता का आंकलन किस पैमाने पर किया जाएगा, जो पदोन्नति वेतन वृद्धि जैसे मामलों के लिए निहायत जरूरी है।

यदि किसी कर्मचारी का जबरन स्थानांतरण,नौकरी समाप्त करने की धमकी, वेतन रोकने, या प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने के लिए विवश किया जाता है, तो जानकार इसे FORCED LABOUR तहत की गई करवाई बताते है । ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुसार, कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से यूनियन गतिविधियों में भाग लेने और अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है। जबकि यहां तो मामला यूनियन के अपने आंतरिक दखल का बताया जाता है लिहाजा कंपनी का इससे दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं होना चाहिए था। यदि किसी कार्रवाई का उद्देश्य कर्मचारियों पर अनुचित दबाव बनाना सिद्ध होता है, तो यह गंभीर श्रम अधिकारों का विषय बनता है। जिसका अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर देर सवेर सामने आ ही जाएगा।देखा जाए तो ऐसे मामले केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं माने जा सकते यदि आरोप सही हैं, तो भविष्य में अन्य कर्मचारियों के साथ भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए सभी कर्मचारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे श्रम कानूनों और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें तथा किसी भी कथित भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर वैधानिक तरीके से आवाज उठाएं।
श्रमिक नेता बी. एल. नेताम का कहना है ऐसे मामले केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं माने जा सकते यदि आरोप सही हैं, तो भविष्य में अन्य कर्मचारियों के साथ भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए सभी कर्मचारियों के लिए यह आवश्यक है कि वे श्रम कानूनों और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें तथा किसी भी कथित भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर वैधानिक तरीके से आवाज उठाएं।
इस पुरे मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि जिन कर्मचारियों का दावा है कि उन्हें यूनियन गतिविधियों के कारण निशाना बनाया गया, उनके समर्थन में संबंधित यूनियनों ने अब तक क्या कदम उठाए? क्या उनके द्वारा प्रबंधन को कोई पत्र लिखा गया? क्या श्रम विभाग या जिला प्रशासन के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई? क्या किसी प्रकार का आंदोलन या कानूनी पहल की गई? यदि नहीं, तो इसके कारणों की भी समीक्षा होनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, यह भी निष्पक्ष जांच के कुछ बिंदु है कि –
* पिछले कुछ वर्षों में कुल कितने कर्मचारियों का स्थानांतरण इसी तरीके से किया गया ? उनमें कितने यूनियन पदाधिकारी या सक्रिय सदस्य थे ? कितनों को बंद पड़े या दूरस्थ इकाइयों में भेजा गया?
* इन स्थानांतरणों का वास्तविक प्रशासनिक आधार क्या था ?
* क्या क्षेत्रीय मार्केटिंग कार्यालय बेंगलुरु से अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग या कोई प्रस्ताव भेजा गया था?
यदि आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि कार्रवाई मुख्यतः यूनियन से जुड़े कर्मचारियों पर केंद्रित रही है, तो यह भेदभावपूर्ण कार्रवाई के आरोपों को गंभीरता से जांचने का आधार बन सकता है।
इस पूरे मामले में आवश्यक है कि प्रबंधन, श्रम विभाग और जिला प्रशासन सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच कराएं, ताकि यदि किसी कर्मचारी के साथ अन्याय हुआ है तो उसे न्याय मिल सके।





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