होमUncategorisedरुढिवादी परंपराओं के खिलाफ विद्रोह का नाम सावित्री बाई फूले

रुढिवादी परंपराओं के खिलाफ विद्रोह का नाम सावित्री बाई फूले

हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं को अध्ययन करने की अनुमति नहीं हैं।समाज में स्त्रियों को सामान्यतः सामाजिक दृष्टि से हीन माना जाता था ।पतियों के आज्ञा का अंध-पालन करना उनका कर्तव्य था।पति के प्रति पत्नी के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए एक लेखक ने कहा है कि वह उसके पांव धोएगी और वे दूसरी सेवाएं करेगी जो एक सेवक को शोभा देती हैं।

स्त्रियों को वेदों के अध्ययन के अधिकार से वंचित रखा जा रहा था।लड़कियों के लिए विवाह की आयु भी कम कर दी गई और इस तरह उनके लिए शिक्षा के अवसर नष्ट कर दिए गए ।

इस काल के किसी भी शब्दकोष में शिक्षिका शब्द का उल्लेख नही मिलता हैं।जो इस बात को प्रमाणित करता है कि उस काल में शिक्षा से लड़कियों को दूर रखा जाता था।

सामान्यतः स्त्रियों पर भरोसा नही किया जाता था और उनके जीवन पर पुरूष संबंधियों का अर्थात पिता,भाई,पति या पुत्र का नियंत्रण होता था। सवर्ण स्त्रियाॅ अलग-थलग रहती थी और सामान्यतः लोगो की दृष्टि से दूर रखी जाती थी।

विज्ञान,लोकतंत्र तथा राष्ट्रवाद की आधुनिक दुनियां की आवश्यकताओं के अनुसार अपने समाज को ढालने की इच्छा लेकर विकासशील भारतीयों ने अपने पारंपरिक धर्मो के सुधार का काम।आरंभ किया ।इसका कारण था कि धर्म उन दिनों जनता के जीवन का एक अभिन्न अंग था और धार्मिक सुधार के बिना सामाजिक सुधार भी कुछ खास संभव नहीं था।

जिस हिन्दू धर्म नारियों की शिक्षा का अनुमति नहीं देता था सावित्री बाई फूले अगर नारियों की शिक्षा के विद्यालय प्रारंभ करती है तो यह सिर्फ सामाजिक सुधार के रूप में नही देखा जा सकता हैं।सावित्री बाई फूले का यह कदम सामाजिक सुधार के साथ रूढिवादी धार्मिक मान्यताओं पर भी भयानक प्रहार था।

वर्तमान दौर में दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी ताकतें देश को हिन्दू राष्ट्र निर्माण की बात करते है । हिन्दू राष्ट्र में वर्तमान संविधान के बदले मनुस्मृति को अपनाया जायेगा।जहां लोकतंत्र,समानता का कोई अधिकार महिलाओं और दलितों को नही रहेगा।महिला और दलितों को शिक्षा से दूर रखा जायेगा।समाज के इन दोनो ही तबको को अपने आप को पूर्ण रूप से उच्च वर्ण और पुरूषों के सेवक के रूप नियोजित करने के लिए विवश होना पड़ेगा।

सावित्री बाई फूले को देश के प्रथम महिला शिक्षिका के रूप में देखने के साथ ही हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि वे धार्मिक रुढिवादी परंपराएं जो महिलाओं को घर के भीतर घरेलू कामकाज तक सीमित कर देना चाहते थे उसके खिलाफ भी उनका विद्रोह था।
-सुखरंजन नंदी

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