बालकोनगर (पब्लिक फोरम )। विशाल औद्योगिक चिमनियों से निकलता धुआं अक्सर विकास की कहानी कहता है, लेकिन बालकोनगर के शांति नगर में यही ‘विकास’ सैकड़ों परिवारों के लिए अस्तित्व का संकट बन गया है। बालको-वेदांता कंपनी के 1200 मेगावाट कूलिंग टावर की भयावह परछाईं में जीने को मजबूर प्रभावित परिवार अब अपने हक़ के लिए सड़क पर उतर आए हैं।
आज, परसाभाठा स्थित बालको गेट के सामने चल रहे इस अनिश्चितकालीन धरने का चौथा दिन है।
शांतिपूर्ण सत्याग्रह, मगर इरादे चट्टान से मजबूत
‘शांति नगर संघर्ष समिति’ के बैनर तले एकजुट हुए इन रहवासियों का यह आंदोलन महज शोर नहीं, बल्कि पीड़ा की एक लंबी खामोशी का विस्फोट है। प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में है, जो इनकी हताशा और संयम दोनों को दर्शाता है। 1200 मेगावाट के कूलिंग टावर से उत्पन्न समस्याओं ने यहाँ के निवासियों का जीना दूभर कर दिया है, जिसके चलते वे अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
दो टूक मांगें: ‘हमें सुरक्षित छत और जीने का जरिया दो’
आंदोलनकारियों की मांगें स्पष्ट हैं और सीधे तौर पर मानवाधिकारों से जुड़ी हैं:-
पूर्ण पुनर्वास: प्रदूषण और खतरे के साये से निकालकर उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर बसाया जाए।
स्थायी रोजगार: प्रभावित परिवारों के भरण-पोषण के लिए कंपनी स्थायी नौकरी सुनिश्चित करे।
निर्णय तक जारी रहेगी जंग
चार दिनों से खुले आसमान के नीचे बैठे इन परिवारों ने स्पष्ट कर दिया है कि कोरे आश्वासनों से अब काम नहीं चलेगा। समिति का कहना है, “जब तक प्रबंधन पुनर्वास और रोजगार पर कोई ‘ठोस और लिखित’ निर्णय नहीं लेता, हम पीछे नहीं हटेंगे।”
यह धरना अब केवल एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट जिम्मेदारी और आम आदमी के ‘जीने के अधिकार’ के बीच का संघर्ष बन चुका है। अब देखना यह है कि बालको प्रबंधन इन जायज मांगों पर कब संवेदनशीलता दिखाता है।





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