शुक्रवार, जून 14, 2024
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पूंजीवादी व्यवस्था में समाजिकता का सुख?

बांटने की सियासत दरअसल सामूहिकता का निषेध है। आप अपने जीवन में ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि जहाँ जहाँ और जितनी मात्रा में सामूहिकता घटती है, दुख, अवसाद, अकेलापन बढ़ता है या महसूस होता। इस अनुभव को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो आप ये भी जान पाएंगे कि आप जाने अनजाने जब सामूहिकता का निषेध करते हैं तो समाज, देश या दुनिया के अमीरों के पैरोकार बन जाते हैं।

पूंजीपति बंटवारे की हर सियासत को फंडिंग करते हैं, आपके खून को निचोड़ कर कमाए मुनाफ़े का एक बड़ा हिस्सा वो बंटवारे की सियासत पर लगाते हैं। कहीं वो नस्ल की बुनियाद पर, कहीं मज़हब की बुनियाद पर तो कहीं भाषा आदि की बुनियाद पर बँटवारे की सियासत खड़ी करते हैं।

अभी जब पूँजीवाद लड़खड़ाते हुए अपने पैरों पर खड़ा ही हो रहा था उसने बँटवारे की सियासत में दुनिया को तबाह करना शुरू कर दिया था। आज भी मध्य यूरोप इस लड़ाई से मुक्त नहीं हो पाया है, हलांकि लाखों जानें अब तक जा चुकी हैं।

दुनिया में इस्लाम के मानने वाले दूसरे नंबर की बड़ी आबादी बनते हैं, लेकिन ये सदियों से शिया और सुन्नी के नाम पर बंटे हुए हैं, एक दूसरे का गला काट रहे हैं। फिर शिया व सुन्नियों के बीच अलग बहुत से समूह हैं जो लड़ रहे हैं। ईसाइयों के भी दो बड़े धड़े हैं फिर रूस के आसपास एक तीसरा धड़ा है, ये भी कई बुनियादों पर बंटे हुए हैं।

भारत सबसे अनोखा है। यहाँ जाति प्रथा लोगों को एक साथ खड़ा नहीं होने देती। चाँद पर पहुँच जाने के बावजूद भारत का सवर्ण बस्ती के दक्षिण में चमार टोले तक नहीं पहुंचा। आरक्षण देना या नहीं देना है, की बहस में जातिगत श्रेष्ठता की ही बहस है।

बंटवारे की ये तमाम लड़ाइयां पूँजीवाद के लिए बहुत लाभकारी हैं। आप जाति, लिंग, धर्म या भाषा या किसी भी बुनियाद पर जब बंटवारे की सियासत को समर्थन देते हैं तो दरअसल आप दुनिया भर के मेहनतकशों की लूट और भ्रष्टाचार को समर्थन देते हैं।

ये सोचना बहुत ज़रूरी है कि सुख का स्रोत सामूहिकता में है, सामूहिकता का निषेध आपको अकेला करता जाता है, अकेला इंसान संपत्ति के पहाड़ पर भी बैठ जाये, वो सुखी नहीं हो सकता है।

एक और पहलू पर सोचिये। मानव समाज का सुख या समृद्धि की बुनियाद ज्ञान है। ज्ञान को तकनीक और सेवा में बदला गया, जिससे जीवन को खुशगवार बनाने के हालात पैदा हो पाए।

आपसे कहा जाता है कि ज्ञान निजी संपत्ति है, इसे खरीदा और बेचा जा सकता है। यही कारण है कि पूंजीपति दुनिया भर का ज्ञान ख़रीद कर उसे प्रोडक्ट में बदल देता है, ये प्रोडक्ट मुनाफ़े की दुनिया के आधार बनते हैं। पर क्या आप हम या सम्पदा किसी एक व्यक्ति से वजूद में आ सकती है?

एक इंसान को पैदा होने के लिए भी दो लोगों की ज़रूरत पड़ती है और ये दो लोग असंख्य लोगों का जीन लेकर आपको निर्मित करते हैं। है न कमाल, एक इंसान जो खुद असंख्य लोगों के सम्मलित योगदान का परिणाम है, वो ज्ञान और सृजन को निजी संपत्ति बताता है !

पूँजीवाद के लिए सामूहिकता ज़हर है, इसलिए वो हज़ार तरीकों से इसे तोड़ता है। सोचकर देखिये, निजी संपत्ति और निजी ज्ञान के संप्रत्य को अगर तोड़ दिया जाए तो दुनिया कैसी होगी?

कोई भी भूख से नहीं मरेगा, महज़ इसलिए किसी की मौत नहीं होगी कि उसे इलाज नहीं मिला, बहुत सी बीमारियाँ ख़त्म हो जायेंगीं, विज्ञान और तकनीक से जो कुछ हम सृजित करते हैं उसका लाभ सभी को मिलेगा। लेकिन ऐसी दुनिया में अम्बानी, अडानी, बिलगेट्स जैसे लोग नहीं होंगे, ऐसे लोग पैदा ही नहीं होंगे।

बस, इस एक कारण से दुनिया का पूंजीपति वर्ग आपको तोड़ता है, अकेला करता है, अकेलेपन को महिमामंडित करता है, अकेलेपन को भी बाज़ार बनाता है, ऐसे आन्दोलन खड़े करवाता है जो स्त्री को पुरुष से, पुरुष को स्त्री से दूर करे, एक भाषा वाले को दूसरी भाषा वालों से, एक जाति वालों को दूसरी जाति वालों से, एक धर्म वालों को दूसरे धर्म वालों से लड़वाता है। आप जब भी इस तरह की किसी लड़ाई का हिस्सा बनें, समझिएगा कि आप इंसान नहीं रोबोट की तरह काम कर रहे हैं। आप आत्महंता होने की ओर अग्रसर हैं। लेकिन आपकी चेतना इतनी तो विकसित है ही कि आप रोबोट बनने से इनकार कर दें। घोषणा कर दें कि आप आत्महंता नहीं बनेंगे।

मेरा ये लेख अगर चंद लम्हे आपको सोचने के लिए रोक सके तो यही इसकी कामयाबी होगी।
आप सभी को प्यार पहुँचे।
-डॉ. सलमान अरशद

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