मंगलवार, जून 18, 2024
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अब बजट–मुक्ति की ओरॽ

निर्मला सीतारमण ने 2022-23 के बजट के नाम पर इस एक फरवरी को पच्चीस साल का सपना पेश किया है। ‘अमृत काल’ का सुंदर नाम देकर पूरी चौथाई सदी के लिए जो पेश किया जा रहा था‚ वैसे तो उसे आजादी के शताब्दी वर्ष तक की मंसूबेबंदी या योजना कहना भी इस शब्द का अर्थ ज्यादा ही खींचना होगा। आखिर‚ योजना और सपने में काफी फर्क होता है। फिर भी‚ अगर इसे चौथाई सदी की योजना ही मान लिया जाए, तब भी इस विडंबना को अनदेखा करना मुश्किल है कि पूरे 25 साल की यह योजना‚ उसी नरेन्द्र मोदी सरकार के प्रतिनिधि द्वारा पेश की जा रही थी‚ जिस सरकार ने योजना मात्र की उपयोगिता को खारिज करते हुए‚ उस समूची योजना व्यवस्था तथा योजना आयोग को ही खत्म कर दिया है‚ जिनका जन्म सीधे–सीधे भारत की आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ था।

वास्तव में अब जबकि मोदी सरकार ने ही गणतंत्र दिवस से ठीक पहले‚ 23 जनवरी को नेताजी की जयंती मनाने की परंपरा शुरू कर दी है‚ यह याद दिलाना भी अप्रासांगिक नहीं होगा कि सबसे पहले राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष रहते हुए सुभाष चंद्र बोस ने ही स्वतंत्रता के बाद के भारत के विकास के लिए योजना की जरूरत को पहचाना था और उसके लिए पहली कमेटी का गठन किया था। पंचवर्षीय योजनाओं की व्यवस्था को औपचारिक रूप से खत्म करने के बाद 25 वर्ष के मंसूबे पेश करने वाली मोदी सरकार से इस जनतांत्रिक बारीकी का ध्यान रखने की तो उम्मीद की ही कैसे जा सकती है कि आजादी के फौरन बाद भारत में पंचवर्षीय योजनाओं की जो व्यवस्था अपनाई गई थी‚ उसके लिए पांच वर्ष की ही अवधि कोई मनमाने तरीके से नहीं तय की गई थी। इसका काफी सीधा संबंध उसका अनुमोदन करने वाली संसद तथा उसे लागू करने वाली सरकार का अधिकतम कार्यकाल पांच साल का होने से था। पांच साल के लिए चुनी गई सरकार कहे कि उसने देश के लिए 25 साल की योजना तैयार कर दी है‚ तो इसे क्या कहेंगेे–सामान सौ बरस का‚ पल की खबर नहीं!

‘अमृतकाल’ में चमकीला गुब्बारा!! लेकिन हमारे कहने का अर्थ यह हरगिज नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार नाम बदल कर या नई पैकेजिंग में योजनाबद्ध विकास को वापस ला रही है। बात इससे ठीक उल्टी है। वास्तविकताओं से और जाहिर है कि अपनी विफलताओं की ओर से भी लोगों का ध्यान बंटाने के लिए नये–नये चमकीले गुब्बारे आसमान में छोड़ने की अपनी महारत को ही एक बार फिर आजमाते हुए मोदी सरकार ने अब ‘अमृत काल’ के नाम पर ऐसा ही एक और चमकीला गुब्बारा छोड़ा है।

एक सरल से उदाहरण से इस सचाई को समझा जा सकता है। कोरोना के कहर के अलावा पिछले एक साल का भारत का अगर कोई सबसे उल्लेखनीय घटनाविकास है‚ तो वह ऐतिहासिक किसान आंदोलन है‚ जिसने मोदी सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया। इस आंदोलन के केंद्र में है – नवउदारवादी नीतियों का करीब तीन दशकों से चल रहा खेती–किसानी का बढ़ता संकट। खेती में बढ़ती देशी–विदेशी इजारेदार पूंजी की घुसपैठ को थामने के अलावा इस संकट के दो पहलू खास तौर पर इस आंदोलन के पीछे थे। पहला‚ समुचित एमएसपी के जरिए किसानों की पैदावार का समुचित दाम सुनिश्चित करना। दूसरा, बिजली, पानी, बीज, खाद आदि सभी कृषि लागतों के लगातार बढ़ते दाम पर अंकुश लगाना। इसके बावजूद इस बजट के प्रस्ताव इन दोनों ही पहलुओं से जो करते हैं‚ उस किसान आंदोलन के महkवपूर्ण हिस्से को मोदी सरकार की किसान अंदोलन के सामने अपनी हार के लिए ‘बदले की कार्रवाई’ करार कहना पड़ा है‚ लेकिन क्योंॽ

इस बजट में धान और गेहूं की खरीद के लिए 2.37 लाख रुपये रखे जाने का बहुत ढोल पीटा जा रहा है‚ जबकि सचाई यह है कि यह पिछले वर्ष के इसी मद के लिए 2.48 लाख करोड़ रुपये के आवंटन से कम है। इतना ही नहीं‚ इस सरकारी खरीद के लाभार्थियों की संख्या भी 1.97 करोड़ से घटाकर 1.63 करोड़ कर दी गई है यानी 34 लाख किसानों को इसके दायरे से बाहर ही कर दिया गया है‚ जबकि आंदोलनकारी किसान इस व्यवस्था को सभी फसल तक बढ़ाए जाने की मांग कर रहे थे। वास्तव में इस सरकारी खरीद के लिए एफसीआई तथा विकेंद्रीकृत खरीद योजना के लिए आवंटन में 28 फीसद की कटौती ही की गई है।

अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इसके लिए आबंटन कम रखे जाने और मुद्रास्फीति‚ दोनों के सम्मिलित प्रभाव से 2022-23 में एमएसपी के तहत खरीद में उल्लेखनीय गिरावट ही होने जा रही है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मोदी सरकार के अब भुला ही दिए गए वादे के विपरीत यह बजट जहां किसानों की पहले ही बहुत कम आय के और घटने का ही इंतजाम करता है‚ वहीं किसानों की पैदावार की लागत और बढ़ाने के लिए फसल बीमा‚ खाद्य और उर्वरक सब्सिडी के आवंटन में उल्लेखनीय कटौती कर दी गई है। यहां तक कि बजट में ग्रामीण विकास की हिस्सेदारी भी 5.59 फीसद से गिरकर 5.23 फीसद पर आ गई है। जैसे ग्रामीण क्षेत्र के साथ इस सौतेले बर्ताव को मुकम्मल करने के लिए ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम‚ मनरेगा के लिए आवंटन घटाकर 73000 करोड़ रुपये कर दिया गया है‚ जबकि 2021-22 का संशोधित अनुमान इसी पर 98000 करोड़ रुपये के खर्च का था। यह तब है, जबकि मनरेगा के विचार के प्रति ही घोर हिकारत से शुरू करने बावजूद मोदी सरकार भी आखिरकार यह मानने के लिए मजबूर हुई है कि कोविड संकट के बीच खास तौर से शहरों में काम बंद होने या छूटने के चलते गांवों में लौटे मेहनतकशों की प्राणरक्षा करने में इस कार्यक्रम ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

जाहिर है कि जो मौजूदा हालात में करणीय था‚ उसे न करने से बढ़कर उससे उल्टा ही करने का यह सुलूक सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र के लिए ही सुरक्षित नहीं रहा है। शहरी क्षेत्र के साथ और आम तौर पर समूची अर्थव्यवस्था के साथ ही यह बजट ठीक ऐसा ही करता है। शहरी मध्यम वर्ग तथा साधारण परिवारों को कोई कर राहत नहीं दिए जाने पर ही बख्श नहीं दिया गया है‚ बल्कि शिक्षा‚ स्वास्थ्य‚ समाज कल्याण व्यवस्थाओं आदि से लेकर खाद्य और तेल सब्सिडी तक‚ हरेक क्षेत्र में उल्लेखनीय कटौती भी की गई है। जहां रुपया मूल्य में कटौती नहीं हुई है‚ वहां भी वास्तविक मूल्य में कटौती जरूर की गई है। और यह तब है, जबकि लगभग सभी आर्थिक जानकार इस बात पर एक राय हैं कि रोजगार के लगातार बढ़ते संकट‚ जिसे कोविड ने और बढ़ा दिया है‚ के चलते मेहनत की रोटी खाने वाली जनता के हाथों में क्रय शक्ति घट जाने के चलते ही आर्थिक मंदी के हालात बने हुए हैं।

इस मंदी को पलटने के लिए‚ रोजगार बढ़ाने के कदमों के जरिए और आय में कमी के शिकार परिवारों को प्रत्यक्ष सहायता भी देने के जरिए‚ जनता के हाथों में क्रय शक्ति बढ़ाने की जरूरत है‚ लेकिन इस बजट में गैर–ब्रांडेड पेट्रोलियम पर 2 फीसद उत्पाद शुल्क लगाने और दूसरी ओर कॉरपोरेट करों में कटौती करने के जरिए मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि वह आम महंगाई बढ़ाने के जरिए मेहनतकश जनता की वास्तविक आय को तथा कुल क्रय शक्ति को भी और नीचे खिसकाने के ही रास्ते पर चलती रहेगी, ताकि कॉरपोरेट को ज्यादा–से–ज्यादा रियायत दे सके। आखिर‚ उसका रास्ता गरीबों को और गरीब बनाने का है, तो अमीरों को और अमीर बनाने का भी तो है। और अमृतकाल की भपाड़ेबाजी‚ इसी सचाई पर पर्दा डालने का औजार है। इस चक्कर में बजट ही बजट–मुक्त हुआ जा रहा है‚ तो उसकी बला से!

(आलेख : राजेंद्र शर्मा)
(लेखक ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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